मकबूलजी कृष्ण मोहन की गज़ल बहुत अच्छी लगी और आप के शायर साहब जहां चाहते हैं कि उसके खयाल से फुर्सत कभी नहो वहीं अनिलजी को शिकायत है कि उन्हें याद करने के लिए उनके चाहनेवाले पर एक लम्हा भी नहीं है दोनों की ब़ज़ल के एक-एक शेर मैं पेश कर रहा हूं-
दिल चाहता है फिर वही फ़ुर्सत के रात दिन
मुझको तेरे ख़याल से फ़ुर्सत कभी न हो।
अनिलजी का शेर-
ज़माने को करीने से वो अपने साथ रखता है
मगर मेरे लिए उसको कोई लम्हा नहीं मिलता
आप दोनों को जय लोक मंगल..
पं. सुरेश नीरव
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