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Tuesday, February 9, 2010

मैं न हिन्दू न मुसलमान, मुझे जीने दो

मैं न हिन्दू न मुसलमान, मुझे जीने दो
दोस्ती है मेरा ईमान, मुझे जीने दो।

कोई एहसां न करो मुझ पे तो एहसां होगा
सिर्फ इतना करो एह्सान, मुझे जीने दो।

सबके दुःख दर्द को अपना समझ कर जीना
बस यही है मेरा अरमान, मुझे जीने दो।

लोग होते हैं जो हैरान मेरे जीने से
लोग होते रहें हैरान, मुझे जीने दो।
शाहिद कबीर
प्रस्तुति- मृगेन्द्र मक़बूल

1 comment:

Unknown said...

सबके दुःख दर्द को अपना समझ कर जीना
बस यही है मेरा अरमान, मुझे जीने दो