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Tuesday, February 23, 2010

फिर मुझे प्यास के दरिया में उतारा जाए

 
दीवाना तुम्हारा कोई ग़ैर नहीं
मचला भी तो सीने से लगा क्यूँ नहीं लेते


ख़त लिख कर कभी और कभी ख़त को जलाकर
तन्हाई को रंगीन बना क्यूँ नहीं लेते

तुम जाग रहे हो मुझको अच्छा नहीं लगता
चुपके से मेरी नींद चुरा क्यूँ नहीं लेते 
राजमणिजी जफर गोरखपुरी की ग़ज़लें बहुत अच्छी लगीं खासकर ऊपर  के ये शेर..
मकबूलजी
कतील साहब के इन शेरों के क्या कहने-
शाम के धुंधले चेहरे को निखारा जाए
क्यों न सागर से कोई चाँद उभारा जाए।

रास आया नहीं तस्कीन का साहिल कोई
फिर मुझे प्यास के दरिया में उतारा जाए। बधाई स्वीकारें।
पं. सुरेश नीरव

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