शाम के धुंधले चेहरे को निखारा जाए
क्यों न सागर से कोई चाँद उभारा जाए।
रास आया नहीं तस्कीन का साहिल कोई
फिर मुझे प्यास के दरिया में उतारा जाए।
मेहरबां तेरी नज़र, तेरी अदाएँ क़ातिल
तुझ को किस नाम से ऐ दोस्त पुकारा जाए।
मुझको डर है, तेरे वादे पे भरोसा कर के
मुफ़्त में ये दिले- खुशफ़हम न मारा जाए।
जिसके दम से तेरे दिन-रात दरख्शां थे क़तील
कैसे अब उस क बिना वक़्त गुज़ारा जाए।
क़तील शिफ़ाई
प्रस्तुति- मृगेन्द्र मक़बूल
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