ज़माना कह रहा है इस लिए हर बार क्या कहना
बहुत मक़बूल हैं, मक़बूल के अशआर क्या कहना।
नमी आँखों में, दिल में दर्द, हम खामोश हैं फिर भी
समंदर में अचानक उठ रहे हैं ज्वार क्या कहना।
ज़मीं पर पैर, लेकिन ख्वाईशें हैं चाँद तारों की
इस लिए उनसे हुई तक़रार, क्या कहना।
तुम्हें देखा, भरी बरसात में, जब शाम को छत पर
सुलगते हैं, तभी से से दिल में ये अंगार क्या कहना।
शकर महंगी, मगर ईमान सस्ता है दुकानों में
यही सब लिख रहे हैं आजकल अखबार क्या कहना।
मृगेंद्र मक़बूल
2 comments:
it's a great post
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shuriyaa.
maqbool
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