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Friday, February 19, 2010

ज्ञानेन्द्र चतुर्वेदी सुस्वागतम

ज्ञानेन्द्र चतुर्वेदीजी सुस्वागतम। आज आपका हसीन फोटो और खूबसूरत परिचय देखा। सुखद आश्चर्य हुआ कि आप इतनी व्यस्तता में भी अपना दायित्व निभाना नहीं भूले। और अपनी शानदार हाजिरी आपने दर्ज की है। उम्मीद की जानी चाहिए कि आप समय-समय पर ब्लॉग पर अपने विचारों के साथ हाजिर होते रहेंगे। और लोकमंगल परिवार की गतिविधियों को आगे बढ़ाते रहेंगे। जय लोकमंगल परिवार की ओर से आपका हार्दिक स्वागत  है।
पं. सुरेश नीरव
मकबूलजी
खुमार साहब की गजल बहुत बढ़िया रही। खासकर के ये शेर-
मेरे राहबर, मुझको गुमराह कर दे
सुना है कि मंज़िल क़रीब आ गई है।

ख़ुमार एक बालानोश तू और तौबा
तुझे ज़ाहिदों की नज़र लग गई है।
डॉ. मधु चतुर्वेदी ने डॉ. कैलाश वाजपेयी की बढ़िया रचना पढ़वाई है।बधाई..
सुरेश नीरव

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