भाई मुनीन्द्र नाथ, प० किशोर जी, परमजीत बाली, नीरज गोस्वामी और दिगंबर नासवा जी का मैं तहे- दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ जिन्हों ने मेरी प्रस्तुति को सराह कर मेरी हौसला अफजाई की है। साथ ही ब्लॉग के नए सदस्य श्री ज्ञानेंद्र चतुर्वेदी का जय लोकमंगल में स्वागत है। उम्मीद है वो अपनी उपस्थिति जल्दी जल्दी दर्ज़ कराते रहें गे। आज जनाब हफ़ीज़ जलंधरी की एक ग़ज़ल पेश है।
दिल अभी तक जवान है प्यारे
किस मुसीबत में जान है प्यारे।
तू मेरे हाल का ख़याल न कर
इस में भी एक शान है प्यारे।
रात कम है, न छेड़ हिज्र की बात
ये बड़ी दास्तान है प्यारे।
तल्ख़ कर दी है ज़िन्दगी जिसने
कितनी मीठी ज़बान है प्यारे।
जाने क्या कह दिया था रोज़े- अज़ल
आज तक इम्तिहान है प्यारे।
मैं तुझे बेवफ़ा नहीं कहता
दुश्मनों का बयान है प्यारे।
सारी दुनिया को है ग़लतफ़हमी
मुझ पे तू मेहरबान है प्यारे।
मृगेन्द्र मक़बूल
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