

आज मैं फिराक़ गोरखपुरी साहब की एक ग़ज़ल पेश कर रहा हूं,जो कभी बचपन में सुनी थी मगर आज भी जहन में महकती है। जयलोक मंगल के सभी साथियों को पेशे खिदमत-
हमारा ये तजुर्बा है कि ख़ुश होना मोहब्बत में
हमारा ये तजुर्बा है कि ख़ुश होना मोहब्बत में
कभी पाबन्दियों से छुट के भी दम घुटने लगता है
दरो-दीवार हो जिनमें वही ज़िन्दाँ नहीं होता
ज्ञानेन्द्र चतुर्वेदी (फरौली)
हमारा ये तजुर्बा है कि ख़ुश होना मोहब्बत में
कभी मुश्किल नहीं होता, कभी आसाँ नहीं होता
बज़ा है ज़ब्त भी लेकिन मोहब्बत में कभी रो ले
दबाने के लिये हर दर्द ऐ नादाँ ! नहीं होता
यकीं लायें तो क्या लायें, जो शक लायें तो क्या लायें
कि बातों से तेरी सच झूठ का इम्काँ नहीं होता
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