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Sunday, March 21, 2010

मुझको...

हास्य ग़ज़ल-
आज एक ग़ज़ल कही है। मजाइया ग़ज़ल... उम्मीद है जय लोकमंगल के पाठकों को पसंद आएगी। मुलाहजा फरमाएं-

भरी बरसात का मौसम है न टालो मुझको
मैं दबी खाज हूं तबीयत से खुजालो मुझको

आपने  बूते  पे जिसके  हैं ये कुर्सी  पायी
मैं  वही  जूता  हूं संसद में उछालो मुझको

मैंने  टपकाए  हैं  बंदे  वही जो तुमने चुने
ढूंढती  आज  पुलिस घर में छुपालो मुझको

गर  फुटपाथ  पे  सोया तो कुचल जाऊंगा
अपनी बांहों के ठिकानों में सुलालो मुझको

 ले  के  खंडाला गए डैडी तेरी मम्मी को
और बिंदास भी  मौसम है बुलालो मुझको

 कहीं गफलत में न ये डेट निकल जाए प्रिये
मैं  भरा  चैक  हूं  जल्दी से भुनालो मुझको

इससे  पहले  कि  उड़ाले  कोई छापे में कहीं
मैं  कमाई  हूं  हवाले  की  चुरालो  मुझको

कहीं  झुंझला  के  न वो  वाट लगा दे मेरी
मत  परेशान  करो  इतना  उजालो  मुझको।

पं. सुरेश नीरव

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