ऐसे चुप हैं कि ये मंज़िल भी कड़ी हो जैसे
तेरा मिलना भी जुदाई की घड़ी हो जैसे।
अपने साये से हर गाम लरज़ जाता हूँ
रास्ते में कोई दीवार खड़ी हो जैसे।
मंज़िलें दूर भी हैं, मंज़िलें नज़दीक भी हैं
अपने ही पांओं में ज़ंजीर पड़ी हो जैसे।
कितने नादान हैं, तेरे भुलाने वाले के तुझे
याद करने के लिए उम्र पड़ी हो जैसे।
आज दिल खोल के रोये हैं, तो यूँ खुश हैं फ़राज़
चंद लमहों की ये राहत भी बड़ी हो जैसे।
अहमद फ़राज़
प्रस्तुति- मृगेन्द्र मक़बूल
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