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Friday, March 19, 2010

कोई तो शम्मा जलाने निकले...


जिंदगी तुझ को मनाने निकले

हम भी किस दर्ज़ा दीवाने निकले

कुछ तो दुश्मन थे मुखालिफ -सफ़ में

कुछ मेरे दोस्त पुराने निकले

नज़र अंदाज़ किया है उसने

खुद से मिलने के बहाने निकले

बे-बसारत है ये बस्ती यारों

आईना किस को दिखाने निकले

इन अंधेरों में जियोगे कब तक

कोई तो शम्मा जलाने निकले...

[muKhaalif-saf=in the enemy camp]

[be-basaarat=blind]

प्रस्तुति: अनिल (२०.०३.२०१० अप १२.०० बजे )

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