जिंदगी तुझ को मनाने निकले
हम भी किस दर्ज़ा दीवाने निकले
कुछ तो दुश्मन थे मुखालिफ -सफ़ में
कुछ मेरे दोस्त पुराने निकले
नज़र अंदाज़ किया है उसने
खुद से मिलने के बहाने निकले
बे-बसारत है ये बस्ती यारों
आईना किस को दिखाने निकले
इन अंधेरों में जियोगे कब तक
कोई तो शम्मा जलाने निकले...
[muKhaalif-saf=in the enemy camp]
[be-basaarat=blind]
प्रस्तुति: अनिल (२०.०३.२०१० अप १२.०० बजे )
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