आँख को जाम समझ बैठा था अनजाने में
साक़िया होश कहाँ था तेरे दीवाने में
जाने किस बात की उन को है शिकायत मुझ से
नाम तक जिनका नहीं है मेरे अफ़साने में
दिल के टुकड़ों से तेरी याद की खुशबू न गई
बू-ए- मय बाकी है टूटे हुए पैमाने में
दिल -ए-बर्बाद में उम्मीद का आलम क्या है
टिमटिमाती हुई एक शम्मा है वीराने में
प्रस्तुति: अनिल (२२.०३.२०१० अप ३.१५ बजे )
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