चीनी, चाय, दाल, सब्जी, आटा, फल, गैस, डीज़ल, बस किराया, पानी, बिजली, वैट, स्टेशनरी, सीमेंट, सरिया, सर्विस टैक्स , लकड़ी , प्लाईवुड , फर्नीचर सब हद से ज्यादा महंगे ।
शीला जी बताएं आम आदमी दिल्ली में कैसे जिए?
आप कहती हैं कि राष्ट्रमंडल खेलों के लिए पैसा चाहिए। सरकार के पास जो ग्यारह हज़ार करोड़ रूपये अतिरिक्त थे , वो भी खर्च हो गए।
शीला जी , इंदिरा जी ने भी एशियाई गेम्स कराये थे , रिकार्ड देख लीजिये कितना कम खर्च हुआ था । न तो महंगाई ही सुरसा की तरह बढ़ी थी और न ही आम आदमी पर कोई बोझ ही पड़ा था।
पहले आप ने दिल्ली को पेरिस बनाने की बात कही थी और इसके लिए बेतहाशा रुपया भी बहाया गया। बाद में समय कम होने की दुहाई देकर कहा गया कि जहाँ खेल होंगे , उन इलाकों को ही संवारा जायेगा। इसका मतलब ये हुआ कि सिर्फ खेलों के आयोजन के स्थानों पर ही काम पर फोकस किया जायेगा और दूसरी जगहों पर चल रहे प्रोजेक्ट्स जहाँ के तहां छोड़ दिए जायेंगे। यानी उन पर किया गया खर्च बेकार।
अभी हाल ही में केंद्र सरकार ने राष्ट्रमंडल खेलों के लिए बजट में भी काफी पैसे दिल्ली सरकार को दिए थे। लाख टके का सवाल ये है कि केंद्र सरकार के दिए पैसे, खुद दिल्ली सरकार के ग्यारह हज़ार करोड़ रुपए और अब बारह हज़ार करोड़ जनता से वसूले जाने हैं इन खेलों के लिए। ध्यान रहे इन खेलों के आयोजन के लिए इससे पहले जो खर्च हो चुका है वो अलग है।
शीला जी , दिल्ली एक छोटा सा राज्य है। उसमें भी जहाँ खेल होने हैं उन इलाकों का साईज तो और भी छोटा है और ज्यादातर इलाके नयी दिल्ली में आते हैं जो पहले ही खूबसूरत है। तो इतने सारे रूपये क्यों और किसलिए चाहिए। वैसे भी कोई भी अंतर्राष्ट्रीय आयोजन करना सरकार की जिम्मेदारी है ना कि जनता की। फिर क्यों जनता की जेब पर लगातार डाका डाला जा रहा है।
एक बात और, यमुना की सफाई के नाम पर करोड़ों रूपये बहा दिए गए। आपके पास उनका कोई हिसाब है? क्या यमुना में कोई कैमिकल डाला गया, क्या यमुना के दोनों ओर कोई रोक बनाई गयी, क्या यमुना में गिरने वाले नालों का कोई इंतजाम किया गया ? यदि नहीं , तो इतना रुपया कहाँ गया क्या आपने जानने की कोशिश की।
सरकारी कर्मचारियों को महंगाई भत्ते दे कर उन को तो आप खुश कर देते है । प्राइवेट नौकरी करने वाले लोगों के लिए क्या सोचा है आपने? जनता के लिए जीना मुश्किल होगा तो लूटमार और दूसरे अपराध तो बढ़ेंगे ही ना। यानी क्राइम रेट बढ़ने की जिम्मेदारी भी आपकी सरकार की ही होगी। बेचारी पुलिस पर बेकार ही लोग नाकारा होने का इलज़ाम लगाते हैं।
बहरहाल , जनता अब आपसे तंग आ चुकी है । अगर आप में सही निर्णय लेने की क्षमता नहीं रही, तो कम से कम जन विरोधी फैसले तो मत लीजिये। नहीं सम्हलता राज़ तो गद्दी छोडिये और किसी बेहतर व्यक्ति को मौका दीजिये ।
अनिल (२३.०३.२०१० अप ३.३० बजे )
1 comment:
bahut sundar aur samay sapeksh lekh .aisi chije to nirantar ani chahiye .
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