हर जख्म भर देती हैःहँसी
हमारे विचार और हमारी जीवनशैली 85% बीमारियों को अपने आप ठीक देती है और उसमें शबसे ज्यादा कारगर है हमारी हँसी। जब हम हँसते हैं तो हमारे भीतर बड़ी तेज़ी से न्यूरोकेमिकल परिवर्तन होते हैं। .ये परिवर्तन मस्तिष्क और शरीर के बीच एक ऐसा भालसंसार बनाते हैं जिसमें कि उदासी,निराशा और अकेलेपन के लिए कोई जगह नहीं होती है। हंसते ही शरीर के भीतर न्यूरोपेप्टाइड्स अणुओ का एक केन्द्र बन जाता है।न्यूरोपेप्टाइड्स मस्तिष्क की कोशिकाओं और मस्तिष्क से शरीर की कोशिकाओं के बीच संदेश प्रसारित करते हैं।न्यूरोपेप्टाइड्स की संरचना मूड के हिसाब से बदलती है। दिन में जितनी बार मूड बदलता है .न्यूरोपेप्टाइड्स भी बदलते हैं। ये न्यूरोपेप्टाइड्स हमें संदेश देते हैं कि हँसना अपने अस्तित्व का सम्मान करना है। कुछ ऐसा भाव लेकर ये न्यूरोपेप्टाइड्स सारे खून में दौड़ते रहते हैं। यह दौड़-धूप तभी रुकती है जब हमारी मनोदशा में कोई बदलाव आता है। इस तरह हँसी हमारे मन और शरीर दोनों की टूटफूट की जाने-अनजाने मरम्मत करती रहती है। वऔर हमें सेहतमंद रखती है। मांसपेशियों को आराम
ताजा शोध परिणाम बताते हैं कि भरपूर हँसी मांसपेशियों को जितना सुकून दे देती है उतना सुकून बॉयोफीडबैक यंत्र भी नहीं दे पाते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि एक खूबसूकत सीनरी देखने से ज्यादा एक कार्टून मांसपेशियों को ज्यादा आराम मुहैया करा देता है और हंसने का तो कोई जवाब ही नहीं है। एक भरपूर हँसी तमाम तनाव के खात्मे की कारगर दवा होती है। स्ट्रेस और स्ट्रेन दोनो को खत्म करती है हँसी।
स्ट्रेस हार्मोन को खत्म करती है हँसीताजा शोध परिणाम बताते हैं कि भरपूर हँसी मांसपेशियों को जितना सुकून दे देती है उतना सुकून बॉयोफीडबैक यंत्र भी नहीं दे पाते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि एक खूबसूकत सीनरी देखने से ज्यादा एक कार्टून मांसपेशियों को ज्यादा आराम मुहैया करा देता है और हंसने का तो कोई जवाब ही नहीं है। एक भरपूर हँसी तमाम तनाव के खात्मे की कारगर दवा होती है। स्ट्रेस और स्ट्रेन दोनो को खत्म करती है हँसी।
जब हम तनाव में होते हैं तो हमारे भीतर फाइट या फिर फ्लाइट का संवेग जन्म लेता है। और यह दोनों संवेग हमारी तंदरुस्ती को धीरे-धीरे तबाह करते हैं। ऐसी मनोदशा मों जो रासायनिक परिवर्तन हमारे शरीर में दोके हैं वे एक नकारात्मक सोच को जन्म देते हैं। हँसी ऐसे विशैले रसायनों का सफाया कर देती है। यानी हँसी एक मजाकपूर्ण दवा है मगर जो कभी दवाओं से मजाक नहीं करती। एक हँसी.चार ऐसे न्यूरोएंडोक्राइन हार्मोंस का सफाया करती है जो कि हमें तनाव के दौरान तोहफे में मिलते हैं-जिनमें कि एपीनेफ्राइन,डोपेक,कॉर्टीसोल और डोपेक शामिल हैं। हँसी के दौरान तमाम रिलेक्सिंग हार्मोंस शरीर में स्त्रावित होते हैं।
हँसी से बढ़ती है प्रतिरोधक क्षमता
बीमारियों से लड़ने का जो हमारा इम्यून सिस्टम है वह तनाव के कारण कमजोर हो जाता है। जिस कारण बीमारियों से लड़ने की हमारी क्षमता में ह्रास हो जाता है।हँसी इस पर्तिरोधक क्षमता में इजाफा करती है। अब यह मान लिया गया है कि प्रतिरोधक क्षमता का सीधा संबंध सेंस ऑफ ह्यूमर से होता है। जितना विकसित सेंस ऑफ ह्यूमर उतना ही विकसित इंम्यून सिस्टम।
इम्यूनोग्लोब्यूलिंस
Immunoglobulins
इम्यूनोग्लोब्यूलिंस इम्यून सिस्टम का एक हिस्सा है जो जोकि हमारे श्वसनतंत्र के ऊपरी हिस्से की रक्षा करता है। यह हिस्सा सर्दी,जुकामऔर फ्ल्यू से हमारी हिफाजत करता है। हमारी लार में IgA होता है जोकि शरीर की पहली रक्षा पंक्ति होती है और जिसका काम श्वसन संबंधी वायरल और बैक्टीरियल हमलों से शरीर की हिफाजत करना होता है। एक आधे घंटे की कॉमेडी फिल्म देखने पर बड़े और बच्चे दोनों के खून और लार में IgA स्तर में पर्याप्त इजाफा हो जाता है।इम्यूनोग्लोब्यूलिंस-m और इम्यूनोग्लोब्यूलिंस-G के स्तर में भी हासने के समय वृद्धि होती देखी गई है। इतना ही नहीं घाव को सड़नो और गलने से बचानेवाले ऱक्षात्मक पदार्थ मंप्लीमेंट-3 के स्तर में भी हँसने के दौरान पर्याप्त बढ़ोतरी होती है।
कोशा प्रतिरक्षातंत्र
हास्य, शरीर की कोशिकाओं में और बोनमैरो में बी-कोशिकाओं की संख्या में भी इजाफा कर देता है। ये बी कोशिकाएं रोगाणुओं को मारने की क्षमता रखती हैं। 1 घंटे की एक हास्य फिल्म देखने के दौरान इनमें इतना इजाफा हो जाता है कि फिल्म देखने से पहले और फिल्म देखने के बाद के रक्त नमूने में इन्हें साफ-साफ देखा जा सकता है। इतना ही नहीं बी कोशिकाओं के साढ-साथ साइटोटोक्सिक टी-कोशिखाएं जो कि बी-कोशिकाओं की सहायक कोशिकाएं होती हैं इनमें भी इजाफा होता है। हाल के प्रयोगों ने सिद्ध कर दिया है कि हँसी के दौरान इम्यून सिस्टम को मजबूती देनेवाले गामा इंटरफेरोन स्तर में भी इजाफा होते देखा गया है। इस प्रकार हास्य इम्यून सिस्टम को टर्नऑन करने का एक स्वाभाविक जरिया है।
हास्य दवा है कई बीमारियों की
हँसी दर्द को मजाक-ही मजाक में दूर करने का पैदाइशी गुण है। यानी एक जन्मजात पेनकिलर।
एक प्रयोग के तहत ऐसे मरीजों को जो कि स्पाइनलकॉर्ड के दर्द से,गठिया से या एसी ही किसी बड़ी शल्यचिकित्सा के कारण दर्द पीड़ित थे। उन्हे हास्यफिल्म दिखाई गई तो इनके दर्द में उल्लेखनीय कमी देखी गई। देखा गया कि दस मिनट की फिल्म देखकर मरीज़ आधे घंटे दर्दरहित नींद का मज़ा लेते पाए गए। 74% मरीज़ों का मानना था कि दस मिनट की एक फिल्म दो पिनकिलर के बराबर का असर रखती है। ग्रूशो मार्क्स जैसे मनोवेज्ञानिक का मत है कि सर्कस का एक विदूषक एस्प्रीन की गोली सो दोगुना ज्यादा असरदायक होता है। हँसने के समय शरीर से एंडोर्फिन नामक दर्दनिवारक हार्मोन पैदा होता है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि हंसते समय शरीर में ऐसे रासायनिक परिवर्तन होते हैं जो मनुष्य को कुछ समय के लिए दर्द को भूल जाने की क्षमता प्रदान करता है। और मांसपेशियों को भी रिलेक्स कर देता है।
हास्य-विनोद दिल के मामले में एक बढ़िया कार्डियक एक्सर्साइजर है। हृदयपेशियों को हँसते समय संकुचन और फैलाव की पूरी सुविधा मिलती है। रक्तप्रवाह तेज़ हो जाता है जिससे दिल को मेहनत कम करनी पड़ती है नतीजतन रक्तचाप नियंत्रित हो जाता है।
साधारतः जो लोग सांस लेते हैं उसमें सांस लेने और सांस के बाहर निकलने के बीच संतुलन टूट जाता है। खासकर सांस की बीमारी से ग्रस्त लोग। ऐसे लोग जितनी सांस भीतर लेते हैं उसमें से कुछ मात्रा इनके फेंफड़ों में ही रह जाती है। नतीजतन शेष रही ऑक्सीजन कार्बन डाइऑक्साइड और भाप में बदल जाती है। यह भाप जो फेंफड़ों में बनती है वह फेंफड़ों को बेक्टीरियल इनफेक्शन के लिए संवेदनशील बना देती है। और व्यक्ति कफ और एस्थमा-जैसे रोग का शिकार हो जाता है। पेटपकड़ हँसी फेफड़ों और डॉयफर्गम पेशियों की एक्सरसाइज करा देती है। सांस के बाहर और भीतर के बीच एक संतुलन बन जाता है। ठीक वैसा ही जैसा कि मेडीटेशन या योग के दौरान बनता है। फेंफड़ों मे रुकी सांस और कॉर्बन डाइऑक्साइड बाहर निकल जाती है। कभी-कभी जोर से हँसने पर तेज़ खासी भी आ जाती है जो कि फेंफड़ों में जमें कफ को भी बाहर निकाल देती है। और आदमी हंसते-हँसते आरोग्य की ओर कदम बढ़ा देता है।
स्तनपान करानेवाली माँओं के लिए हँसना बहुत ज़रूरी है
स्तनपान करानेवाली माँओं के लिए भी हँसना बहुत ज़रूरी है क्योंकि हँसने से जहां उसकी सांस संबंधी बीमारियों से उसे मुक्ति मिलती है वहीं हँसी खून में इम्यूनोग्लोबिंस का स्तर भी बढ़ा देती है जिस के कारण बच्चे में भी रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है। मां के हँसने पर उसके दूध में मिलाटोनिन की मात्रा बढ़ जाती है जो कि बच्चे को तनाव और त्वचा रोगों से मुक्ति दिलाने में मददगार होती है।
जिनको हँसी से अरुचि होती है ऐसे लोग प्रायः कार्डियोवेस्कुलर डिसीज ( दिल की पेशियों की बीमारी) तथा गेस्ट्रोइंटेस्टिनल-जैसी बीमारियों की पकड़ में जल्दी आ जाते हैं।
इम्यूनोग्लोब्यूलिंस
Immunoglobulins
इम्यूनोग्लोब्यूलिंस इम्यून सिस्टम का एक हिस्सा है जो जोकि हमारे श्वसनतंत्र के ऊपरी हिस्से की रक्षा करता है। यह हिस्सा सर्दी,जुकामऔर फ्ल्यू से हमारी हिफाजत करता है। हमारी लार में IgA होता है जोकि शरीर की पहली रक्षा पंक्ति होती है और जिसका काम श्वसन संबंधी वायरल और बैक्टीरियल हमलों से शरीर की हिफाजत करना होता है। एक आधे घंटे की कॉमेडी फिल्म देखने पर बड़े और बच्चे दोनों के खून और लार में IgA स्तर में पर्याप्त इजाफा हो जाता है।इम्यूनोग्लोब्यूलिंस-m और इम्यूनोग्लोब्यूलिंस-G के स्तर में भी हासने के समय वृद्धि होती देखी गई है। इतना ही नहीं घाव को सड़नो और गलने से बचानेवाले ऱक्षात्मक पदार्थ मंप्लीमेंट-3 के स्तर में भी हँसने के दौरान पर्याप्त बढ़ोतरी होती है।
कोशा प्रतिरक्षातंत्र
हास्य, शरीर की कोशिकाओं में और बोनमैरो में बी-कोशिकाओं की संख्या में भी इजाफा कर देता है। ये बी कोशिकाएं रोगाणुओं को मारने की क्षमता रखती हैं। 1 घंटे की एक हास्य फिल्म देखने के दौरान इनमें इतना इजाफा हो जाता है कि फिल्म देखने से पहले और फिल्म देखने के बाद के रक्त नमूने में इन्हें साफ-साफ देखा जा सकता है। इतना ही नहीं बी कोशिकाओं के साढ-साथ साइटोटोक्सिक टी-कोशिखाएं जो कि बी-कोशिकाओं की सहायक कोशिकाएं होती हैं इनमें भी इजाफा होता है। हाल के प्रयोगों ने सिद्ध कर दिया है कि हँसी के दौरान इम्यून सिस्टम को मजबूती देनेवाले गामा इंटरफेरोन स्तर में भी इजाफा होते देखा गया है। इस प्रकार हास्य इम्यून सिस्टम को टर्नऑन करने का एक स्वाभाविक जरिया है।
हास्य दवा है कई बीमारियों की
हँसी दर्द को मजाक-ही मजाक में दूर करने का पैदाइशी गुण है। यानी एक जन्मजात पेनकिलर।
एक प्रयोग के तहत ऐसे मरीजों को जो कि स्पाइनलकॉर्ड के दर्द से,गठिया से या एसी ही किसी बड़ी शल्यचिकित्सा के कारण दर्द पीड़ित थे। उन्हे हास्यफिल्म दिखाई गई तो इनके दर्द में उल्लेखनीय कमी देखी गई। देखा गया कि दस मिनट की फिल्म देखकर मरीज़ आधे घंटे दर्दरहित नींद का मज़ा लेते पाए गए। 74% मरीज़ों का मानना था कि दस मिनट की एक फिल्म दो पिनकिलर के बराबर का असर रखती है। ग्रूशो मार्क्स जैसे मनोवेज्ञानिक का मत है कि सर्कस का एक विदूषक एस्प्रीन की गोली सो दोगुना ज्यादा असरदायक होता है। हँसने के समय शरीर से एंडोर्फिन नामक दर्दनिवारक हार्मोन पैदा होता है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि हंसते समय शरीर में ऐसे रासायनिक परिवर्तन होते हैं जो मनुष्य को कुछ समय के लिए दर्द को भूल जाने की क्षमता प्रदान करता है। और मांसपेशियों को भी रिलेक्स कर देता है।
हास्य-विनोद दिल के मामले में एक बढ़िया कार्डियक एक्सर्साइजर है। हृदयपेशियों को हँसते समय संकुचन और फैलाव की पूरी सुविधा मिलती है। रक्तप्रवाह तेज़ हो जाता है जिससे दिल को मेहनत कम करनी पड़ती है नतीजतन रक्तचाप नियंत्रित हो जाता है।
साधारतः जो लोग सांस लेते हैं उसमें सांस लेने और सांस के बाहर निकलने के बीच संतुलन टूट जाता है। खासकर सांस की बीमारी से ग्रस्त लोग। ऐसे लोग जितनी सांस भीतर लेते हैं उसमें से कुछ मात्रा इनके फेंफड़ों में ही रह जाती है। नतीजतन शेष रही ऑक्सीजन कार्बन डाइऑक्साइड और भाप में बदल जाती है। यह भाप जो फेंफड़ों में बनती है वह फेंफड़ों को बेक्टीरियल इनफेक्शन के लिए संवेदनशील बना देती है। और व्यक्ति कफ और एस्थमा-जैसे रोग का शिकार हो जाता है। पेटपकड़ हँसी फेफड़ों और डॉयफर्गम पेशियों की एक्सरसाइज करा देती है। सांस के बाहर और भीतर के बीच एक संतुलन बन जाता है। ठीक वैसा ही जैसा कि मेडीटेशन या योग के दौरान बनता है। फेंफड़ों मे रुकी सांस और कॉर्बन डाइऑक्साइड बाहर निकल जाती है। कभी-कभी जोर से हँसने पर तेज़ खासी भी आ जाती है जो कि फेंफड़ों में जमें कफ को भी बाहर निकाल देती है। और आदमी हंसते-हँसते आरोग्य की ओर कदम बढ़ा देता है।
स्तनपान करानेवाली माँओं के लिए हँसना बहुत ज़रूरी है
स्तनपान करानेवाली माँओं के लिए भी हँसना बहुत ज़रूरी है क्योंकि हँसने से जहां उसकी सांस संबंधी बीमारियों से उसे मुक्ति मिलती है वहीं हँसी खून में इम्यूनोग्लोबिंस का स्तर भी बढ़ा देती है जिस के कारण बच्चे में भी रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है। मां के हँसने पर उसके दूध में मिलाटोनिन की मात्रा बढ़ जाती है जो कि बच्चे को तनाव और त्वचा रोगों से मुक्ति दिलाने में मददगार होती है।
जिनको हँसी से अरुचि होती है ऐसे लोग प्रायः कार्डियोवेस्कुलर डिसीज ( दिल की पेशियों की बीमारी) तथा गेस्ट्रोइंटेस्टिनल-जैसी बीमारियों की पकड़ में जल्दी आ जाते हैं।
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