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Thursday, March 18, 2010

यो,ाग्निः तंत्र से उपनिषद तक की लोक यात्रा

उपन्यास-समीक्षा
योषाग्नि वेश्या जीवन पर आधारित एक आत्मकथात्मक उपन्यास है,जिसमें कुशल लेखक ने वेश्यालय और वेश्या समाज के बंद अभिलेखागार में फलती-फूलती रतिरोग की प्रयोगशाला के उन प्रभावों को बड़ी बारीकी से खंगाला है जो बड़े दबे पांव सारे समाज को अपने शिकंजे में जकड़ लेता है। साथ-ही-साथ वेश्या को तंत्रागम में महाश्मशान क्यों कहा गया है इसकी भी शास्त्रीय व्याख्या की है।हिदी में वेश्या जीवन को लेकर आचार्य चतुरसेन शास्त्री(नगरवधु),पांडेयबेचन शर्मा उग्र (शराबी),भगवती चरण वर्मा (चित्रलेखा),अमॉतलाल नागर (ये कोठेवालियां), मनोहरश्याम जोशी (कुरु-कुरु-स्वाहा), और राजकमल चौधरी (मछली मरी हुई) जैसे अनेक उपन्यास लिखे गए हैं मगर योषाग्नि का दर्जा अलेक्जेंडर कुप्रीन द्वारा लिखे गए उपन्यास यामा द पिट के समकक्ष ही है।
लेखक की यह धारणा है कि यदि पत्नी समाज द्वारा स्वीक्रत है तो वेश्या के लिए भी लाइसेंस है,मंडी है और प्रेम घड़ी के दोलक की तरह इन दोनों ध्रुवों के बीच गतिवान रहता है।इसलिए वेश्या के जीवन पर ना लिखना समाज के एक कटु सत्य को दो आड़ी लकीरों से काटकर खारिज करने का एक बचकाना प्रयास है। योषाग्नि में लेखक ने वेश्या समाज के गोपनीय तथ्यों को जहां सफलतापूर्वक उजागर इस उपन्यास के जरिए किया है वहीं इस उपेक्षित जीवन का एक नया सौंदर्यविधान भी रचा है। घाट-घाट का पानी पीनेवाली वेश्या को समाज हेय दृश्टि से देखता है मगर वेश्या उपज भी समाज की ही होती है इसलिए इससे आंखें मूंदना शुतुर्मुर्गीय  प्रवृति ही मानी जाएगी। घाट का अर्थ तीर्थ होता है। लेखक ने इस उपन्यास में उस घाट की ही बड़े पवित्र मन से यात्रा कराई है। सचमुच इसे पढ़ना तीर्थ में स्नान करने-जैसा ही है। सचमुच जो जल की सतह पर तैरते हैं वह मोती कहां ला पाते हैं इसकेलिए तो गोता लगाना होता है। एक खोजी डुबकी का सात्विक आमंत्रण है यह उपन्यास। हड़बड़ी में पढ़े जाने पर यह उपन्यास प्रौढ़ पुर्वग्रहों की पोर्नोग्राफी लग सकता है मगर पर्त-दर-पर्त भीतर उतरने पर यह कृति पाठक की चेतना को शून्य की हथेली पर रखी झिलमिलाती शाश्वत ज्योतिषचेतना की प्रदीप्ति में दीप्त-प्रदीप्त करने की सामर्थ्य रखती है।योषाग्नि का केन्द्रीय विषय काम है और कामिनी इस उपन्यास का परिवेश है। और जब चर्चा काम की हो तो दमन,गमन और नमन के मोड़ से गुजरना स्वाभाविक है। उपन्यास तंत्र की गहन,गुह्य कंदराओं और श्मशानी साधना के अपरिचित बीहड़ों से निकलता हुआ उपनिषदों के सनातन दर्शव तक की अनुभूति यात्रा करता है। अनुभूतियों की गठरी को लेकर पाठक को दुरूह यात्रा लेखक नहीं कराता है बल्कि उसे समकालीन सच बनाकर पाठक को उससे आत्मीय संवाद करने का मौका मुहैया कराता है। यह उपन्यास पाठक को वह कुव्वत देता है जिसके तई वह खुद फैसला कर सके कि वेश्यालय अभिषाप है या समाज का असाधु सच। वेश्या क्या है इसके बजाय वेश्या क्यों है यह जानने की आदमकद जिज्ञासा पैदा करने में यह उपन्यास पूरी तरह कामयाब है और यही इस उपन्यास का मूल उद्देश्य भी है। संस्कृति और विकृति के बीच मानवीय पकृति की तलाश है-योषाग्नि।
योषाग्नि(उपन्यास)
लेखकः आचार्य निशांत केतु
प्रकाशकः निर्मल पब्लिकेशंस,दिल्ली-110094
प्रष्ठः407,मूल्यः200 रुपये

समीक्षकः पं. सुरेश नीरव

1 comment:

vedna said...

नीरव जी ,नही मालूम उपन्यास में क्या कुछ होगा मगर नाम ही इतना कौतूहल पूर्ण ------|
योषाग्नि जिसने शब्द कोष को पलटने पर मजबूर कर दिया योशा अर्थात स्त्री ,योषाग्नि अर्थात स्त्री अग्नि या स्त्री की अग्नि |अग्नि क्या केबल स्त्री में ही होती है -----|
बहरहाल इसके नाम ने पढ़ने को प्रेरित किया है |मेहरबानी होती अगर आप इसे प्राप्त करने का उचित ठिकाना मुझे देते |क्योंकि मुझे ये बाइ पोस्ट मगाना होगा |
धन्यवाद