आदरणीय नीरव जी , हंस जी और राजमणि जी का शुक्रिया कि आपने मेरी रचनाओं को पसंद किया और सराहा।
आज लोकमंगल के पाठकों के लिए पेश है ये ग़ज़ल ...
दिन को भी इतना अन्धेरा है मेरे कमरे में
साया आते हुए डरता है मेरे कमरे में
गम थका हारा मुसाफिर है चला जायेगा
कुछ दिनों के लिए ठहरा है मेरे कमरे में
सुबह तक देखना अफसाना बना डालेगा
तुझको एक शख्स ने देखा है मेरे कमरे में
दर-ब-दर दिन को भटकता है तसव्वुर मेरा
हाँ मगर रात को रहता है मेरे कमरे में
चोर बैठा है कहाँ सोच रहा हूँ मैं दोस्त
क्या कोई और भी कमरा है मेरे कमरे में
प्रस्तुति: अनिल (०५.०४.२०१० अप ३.१५ बजे )
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