आदरणीय नीरव जी, पिछले दिनों जब आप ग्वालियर में थे तब आप से एक लम्बी चर्चा हुई । आपने समय देकर मुझसे बात की तो मन को संतोष हुआ । आपका आदेश सर आँखों पर कि लोक मंगल पर हमारी मुलकात नहीं हुई । क्षमा । पिछले दिनों अनेक रचनाएं और व्यंग्य अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए । मेरे ब्लोगिंग को भी पत्रों ने
स्थान दिया । जनसत्ता की एक कटिंग लगा रहा हूँ । आपका आशीर्वाद चाहूँगा ।
स्थान दिया । जनसत्ता की एक कटिंग लगा रहा हूँ । आपका आशीर्वाद चाहूँगा ।
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