बहुत हसीं है मेरा दिलरुबा ना हो जाये
मेरी नज़र में वो काफिर खुदा ना हो जाये
तमाम शहर में मेरी वफ़ा की खुशबू है
पुराना जख्म किसी का हरा ना हो जाये
ना जाने कितने बरस बाद वो मिला है मुझे
है डर यही कि वो फिर से जुदा ना हो जाये
मै उस से टूट के मिलता हूँ जब भी मिलता हूँ
ये मेरा मिलना कहीं हादसा ना हो जाये
प्रस्तुति: अनिल ( ०३.०४.२०१० अप १२.३० बजे)
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