इस दौर की कुछ इस तरह कहानी है
नदी में आग लगी है, नहर में पानी है।
जो खिल रहा वो बुढ़ापा है चंद पेड़ों क़ा
जो जल रही वो नई पौध की जवानी है।
चमन संवारने वाले ही कह रहे हैं ये
सजाना एक ही क्यारी को बागबानी है।
लगा है वो जो शिलान्यास क़ा जर्जर पत्थर
वही तो एक प्रगति की बची निशानी है।
लबे- सड़क ही मनाते हैं लोग दीवाली
गली युगों से अंधेरों की राजधानी है।
ये तय हुआ है कि अगले चुनाव से पहले
हरेक बांह की औकात आज़मानी है।
तमाशा देख लो, सुन लो, मगर रहो ख़ामोश
पराग शर्त अब जीने की बेज़ुबानी है।
ओ० पी० चतुर्वेदी पराग
प्रस्तुति- मृगेन्द्र मक़बूल
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