अप्रैल फूल की पोस्ट पर नीरव जी और राजमणि जी ने जो हौसला अफजाई की , उसका तहे दिल से शुक्रिया।
दरअसल जय लोकमंगल अप्रैल फूल वाले दिन बहुत नीरस -सा हो रहा था। सो, मित्रों के लिए ये मजेदार पोस्ट कर दी ताकि कुछ तो मनोरंजन हो।
आज आपकी खिदमत में पेश है एक छोटी सी ग़ज़ल...
धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
जिंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो
वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बना कर देखो
पत्थरों में भी जुबां होती है दिल होते हैं
अपने घर की दर-ओ-दीवार सजा कर देखो
फासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है
वो मिले या ना मिले हाथ बढ़ा कर देखो
प्रस्तुति: अनिल (02.04.२०१० सायं ४.३० बजे)
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