लोग सुनते रहे दिखाने को
कौन समझा मगर फ़साने को।
और क्या देखने को बाक़ी है
ख़ूब देखा है इस ज़माने को।
उनका आना भी इक बहाना था
वक़्त अपना कहीं बिताने को।
दर्द की टीस थोड़ी कम कर दे
ऐसी मरहम कहाँ लगाने को।
हमने मक़बूल ये ख़ता की है
आगए, तुमसे दिल लगाने को।
मृगेन्द्र मक़बूल
No comments:
Post a Comment