नैमिषारण्य
भारतीय साहित्य में अरण्यों का उल्लेख खूब हुआ है। पुराण,वेद,महाभारत,रामायण से लेकर रामचरितमानस तक न जाने कितनें अरण्य अपने आंचल में कितनी-कितनी रोचक कथाएं समेटे हुए हैं। इन अरण्यों का उल्लेख साहित्य में होना इस बात का प्रतीक है कि हमारी संस्कृति का मूल स्त्रोत अरण्य ही रहे हैं। ये अरण्य सिर्फ जंगल नहीं थे। बल्कि हमारी सभ्यता और संस्कृति के जीवंत केन्द्र थे। चेतना की यज्ञशाला थे। अरण्य,आश्रम, और यज्ञ इनकी त्रयी से मिलकर ही बना है हमारा सांस्कृतिक वांड्ग्मय। अरण्य वन है तो अरणि यज्ञ में प्रयुक्त होनेवाली लकड़ी। अरणि का विस्तार अरण्य में देखती है भारतीय मनीषा। अरण्य वन की विकसित स्थिति है। वन में दैत्य और राक्षस भी रहते रहे हैं। जो ऋषियों को उनके धार्मिक अनुष्ठान में उत्पात मचाकर पीड़ित करते रहे हैं। इनके दमन के लिए देवताओं को ऋषियों की ओर से रण करना पड़ता था। दुष्टात्माओं के वध के बाद जिन क्षेत्र में रण की कोई संभावना नहीं रह जाती है उस वन को ही अरण्य कहा जाता है। अरण्य ही अभयारण्य थे। जहां रण न होकर सिर्फ मेल-मिलाप हो। आध्यात्मिक विकास के लिए पूजा,प्रार्थनाएं, योग, ध्यान और यज्ञ हों। जहां भय नहीं अभय की व्याप्ति हो। अरण्य में हवन करते थे ऋषि और संत। वन करने का अर्थ है निवास करना। जहां ऋषि तपस्या के लिए निवास करते हों वही तपोवन है। जहां शांति मुद्रा में ऋषि विश्राम करें वही शांतिवन है। जहां बैठकर प्रकृति और ऋतुओं का मधुपान हो वही मधुवन है। वन का एक अर्थ पूजा भी है। इसीसे बनता है स्तवन। वनस्थली ही पूजा स्थली है। वन का अर्थ प्रार्थना करना भी है। वन का अर्थ याचना करना भी है। जो कि सकाम है। वनुते जलम। उसने जल की याचना की। इस तरह वन निष्काम भी है और सकाम भी। वानप्रस्थी बनकर साधु,संत वन को ही महिमामंडित करते रहे हैं। श्रीकृष्ण तो कहलाते ही वनमाली थे। वनमाला पहनते थे और वृंदावन में विचरते थे। वन से इतना प्रेम था वनमाली श्रीकृष्ण को कि उन्होंने जो द्वारिका बसाई उसे भी वनमालिनी ही नाम दिया। वन, शिक्षा के सुविकसित केन्द्र हुआ करते थे। राजा अपने पुत्रों को वन स्थित आश्रमों में ही पढ़ने भेजते थे। राम,लक्ष्मण ने वन जाकर ही शिक्षा गृहण की थी। वन पुत्रों की वीरता के आगे नागर संस्कृति के योद्धा पानी भरते थे। लव-कुश वन पुत्र ही थे। राजा दुष्यंत के पुत्र भरत जंगलों में शेरों के बीच ही रहकर पले थे। जिनके नाम से इस देश का नाम भारत पड़ा। ये वीर वन पुत्र राक्षसों के आतंक से वनों को मुक्त कराते थे। और ऋषियों को अपने धार्मिक अनुष्ठान के लिए अरण्य प्रदान करते थे। ऋषियों को ऐसे अरण्यों की हमेशा तलाश रहती थी। वायुपुराण में ऋषियों ने ब्रह्माजी से ऐसे ही निरापद स्थान की याचना की थी। कहते हैं कि ऋषियों ने मानव कल्याण और विश्वशांति के लिए निर्बाध यज्ञ करने के लिए एक ऐसे ही भूखंड की मांग की थी जहां कलयुग का तनिक भी प्रभाव न हो और ऋषियों को निर्बाध पूजा का परिवेश मिल सके। ऋषियों की प्रार्थना सुनकर ब्रह्माजी ने तत्काल मनोमयचक्र की सृष्टि की और इसे भगवान शिव को अर्पित करते हुए पृथ्वी पर फेंक दिया। ब्रह्माजी ने ऋषियों को बताया कि यह चक्र जिस जगह पर जाकर रुकेगा वह भूमि ही तपस्या के लिए उचित भूमि होगी। ऋषि-मुनि उस चक्र के पीछे-पीछे दौड़ते रहे। हजारों मील की यात्रा के बाद यह मनोमाया चक्र ऐसे स्थान पर आकर रुका जहां एक विशाल पहिए के आकार का वन फैला हुआ था। संस्कृत में पहिए को नेमि कहते हैं और जंगल को अरण्य इसीलिए इस वन का नाम नैमिषारण्य पड़ गया। कहा जाता है कि ब्रह्माजी का मनोमाया चक्र इस भूमि पर इतने वेग से गिरा कि गिरने के स्थान पर एक जलस्त्रोत फूट पड़ा। शिव के लिंग की आकृति में जलधार इतनी तेजी से बह रही थी कि सारा अरण्य ही जलमग्न होने लगा। ऋषि-मुनि व्यग्र हो प्रभु से प्रार्थना करने लगे। करुणामयी प्रभु ने भक्तों की प्रार्थना सुन मदद के लिए मां ललिता को प्रथ्वी पर भेजा। शक्तिरूपा मां प्रकट हुईं। और उन्होंने अनियंत्रित जल को सोखकर नियंत्रित कर दिया। चक्र के गिरने से जो कुंड बना वही चक्रकुंड कहलाया। इस चक्रकुंड तीर्थ का बड़ा महत्व है। इस चक्रकुंड को पृथ्वीमंडल का केन्द्र माना जाता है। ब्रह्मा के मनोमाया चक्र के गिरने से शिवलिंग की आकृति में निकली जलधार आस्था का अमृत स्त्रोत है। ऋषि श्रृंगी,महर्षि उद्दालक,शिकमकेतु और महर्षि प्रवण ने सतयुग में यहीं निवास किया था। मान्यता है कि यहां के जल में स्नान करने से आत्मा पवित्र हो जाती है। दान करने से धन में वृद्धि होती है। आरोग्य की कामना करने से आरोग्य लाभ होता है। रोगों का तुरंत निवारण होता है और पिंडदान करने से सहज ही मोक्ष प्राप्त हो जाता है। अथर्वान के पुत्र दधीचि धर्म का महत्व समझकर यहां राजा से ऋषि बन गए थे। कथा है कि वृत्र नामक राक्षस जब बहुत शक्तिशाली हो गया तो शक्ति पाकर वह निरंकुश हो गया। उसके आतंक से ऋषि-मुनियों को यज्ञ करने भी मुश्किल हो गए। इसकी मिरंकुशता कितनी बढ़ गई होगी इसका अंदाज इसीसे लगाया जा सकता है कि उसने इंद्र को भी परास्त कर यहां से खदेड़ दिया था। ऋषि-मुनियों के साथ स्वयं इंद्र त्राहिमाम-त्राहिमाम करते हुए विष्णु की दरबार में गुहार लगाने जा पहुंचे। और मदद की याचना की। दूरदर्शी विष्णु ने रहस्योदघाटन किया कि वृत्रासुर ब्राह्मण है।
यह किसी साधारण हथियार से नहीं मारा जा सकता है। उसके वध के लिए हमें एक ऐसे वज्र का निर्माण करना होगा जो किसी तेजस्वी ऋषि की अस्थियों से बना हो।
इसके लिए किसी महान ऋषि की अस्थियां चाहिए। विष्णु का यह प्रस्ताव सुनकर तमाम ऋषि अपनी अस्थियां देने को तैयार हो गए। तब विष्णु ने कहा कि इस कार्य के लिए सिर्फ महर्षि दधीचि ही उपयुक्त पात्र हैं। ऋषि समुदाय महर्षि दधीचि के पास पहुंचा और उन्हें भगवान विष्णु का संदेश सुनाया। महर्षि ने हर्षभरे स्वर से कहा, कि मुझे प्रसन्नता होगी यदि मेरा शरीर धर्मरक्षा के लिए काम आएगा। सभी प्राणियों को एक-न-एक दिन यह शरीर त्यागना ही पड़ता है। मेरी मृत्यु के बाद मेरा शरीर भी मिट्टी में मिल जाएगा। इससे बड़ा मेरा और क्या सौभाग्य होगा कि मेरा शरीर धर्म की रक्षा के काम आएगा। यह कहकर महर्षि चक्र-तीर्थकुंड की ओर बढ़ गए। वहां उन्होंने स्नान किया,पूजा की और फिर स्वेच्छा से अपनी अस्थियों का दान करने के लिए धर्म-तुला पर बैठ गए। इंद्र ने उनकी अस्थियों से गदा का निर्माण करवाया। यह वज्र असाधारण था। इस वज्र में धर्म के लिए प्राणोत्सर्ग करवेवाले महर्षि की अस्थियां प्रयुक्त हुईं थीं। इस धर्मयुद्ध में देवताओं की विजय हुई। नृशंस वृत्तासुर मारा गया। और देवताओं को उनका खोया हुआ वैभव वापस मिला। ऋषियों को अपने पूजा-पाठ के लिए निर्बाध वातावरण मिला। इस तरह नैमिषारण्य साक्षी बना महर्षि दधीचि के अनुपम त्याग का। इस नैमिषारण्य को बनने से पहले ही डूबने से बचानेवाली मां शक्तिरूपा ललिता का मंदिर भी यहीं है। जो देश के सिद्ध शक्तिपीठों में से एक है। मां ललिता ने न केवल नैमिषारण्य को डूबने से ही बचाया बल्कि जब महिषासुर नामक राक्षस ने इस क्षेत्र में अपना आतंक फैलाया तो देवताओं की प्रार्थना पर शक्तिरूपा मां ललिता ने भीष युद्ध कर महिषासुर का वध कर नैमिषारण्य को भयमुक्त कर दिया। इसी कारण इनको महिषासुरमर्दनी भी कहा जाता है। त्रेता युग में भी नैमिषारण्य का महत्व रहा है। रामचरितमानस में तुलसीदासजी ने नैमिषारण्य की विस्तार से चर्चा की है। एक कथा यह भी है कि मनुष्य के आदिपूर्वज मनु महाराज और उनकी धर्मनिष्ठ पत्नी सतरूपा ने पच्चीस हजार वर्ष तक कठिन तपस्या की। उनकी इस अप्रतिम साधना से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने इनसे कोई वरदान मांगने को कहा। कहते हैं कि तब मनु महाराज ने ब्रह्माजी को अपने यहां पुत्ररूप में जन्म लेने का वरदान मांगा। ब्रह्माजी ने मनु को वरदान देते हुए कहा कि त्रेतायुग में मैं तुम्हारी यह इच्छा पूरी करूंगा। तुम्हारी पत्नी सतरूपा कौशल्या बनेगी और तुम दशरथ। मैं राम के रूप में तुम्हारे राज्य अयोध्या में पुत्ररूप में जन्म लेकर तुम्हारी मनोकामना पूरी करूंगा। मनु और सतरूपा ने यह उग्र तपस्या नैमिषारण्य में ही की थी। त्रेतायुग का एक और प्रसंग नैमिषारण्य को लेकर प्रचलित है। कहा जाता है कि लंकेश रावण के भाई अहिरावण ने राम और लक्ष्मण का अपहरण कर लिया और वह उनकी बलि चढ़ाने पाताल लोक ले जा रहा था। मकरध्वज ने हनुमानजी को मार्ग बदलने के लिए विवश कर दिया। इसी नैमिषारण्य में हनुमानजी ने अहिरावण का वध किया था। और राम और लक्ष्मण को कंधे पर बैठाकर सुरक्षित यहीं ले आए थे। लाते क्यों नहीं यह नैमिषारण्य बना ही ब्रह्माजी के मनोमाया चक्र से ङै। और भगवान राम के रूप में ही ब्रह्माजी ने जन्म लिया था। रामायण और रामचरितमानस का एक और प्रसंग नैमिषारण्य से जुड़ा हुआ है। कथा है कि धोबी के कहने पर जब भगवान राम ने सीताजी की अग्नि परीक्षा ली तो वह व्यथित होकर बाल्मीकि आश्रम में आकर रहने लगीं। यहीं उन्होंने लव-कुश को जन्म दिया था। आगे चलकर जब राम ने अश्नमेघ यज्ञ किया तो लव-कुश ने इनका घोड़ा रोक लिया। भीषण युद्ध हुआ। वीर बालकों ने हनुमानजी को भी पकड़ कर पेड़ से बांध दिया। सीताजी को जब यह बात पता चली तो वह काफी व्यथित हुईं। मान्यता है कि सीता का जन्म धरती से हुआ था। धरती ही उनकी मां थी। सीता ने धरती मां से गुहार की कि वह उन्हें अपनी कोख में समो ले। और... धरती ने उनकी प्रार्थना सुन सीताजी को अपने अंक में समा लिया। यह धरती में समाने की घटना भी नैमिषारण्य में ही हुई थी। जिस जगह यह घटना हुई थी वहां आज भी सीताकुंड बना हुआ है। नैमिषारण्य के नाम के पीछे नेमि के अलावा निमिष शब्द भी जुड़ा हुआ है। ऐसा माना जाता है कि गौरमुख नामक एक पहुंचे हुए ऋषि ने महा हाहाकारी एक दैत्य को एक निमिष में यानी कि एक पल में इसी अरण्य में जलाकर राख कर दिया था। इसलिए भी इस अरण्य को
नैमिषारण्य कहा गया है। महाभारत के युद्ध के बाद जब दुखी ऋषिगण ब्रह्माजी के पास पहुंचे तो नैमिषारण्य को तपोभूमि बनाने का निर्देश उन्होंने ही दिया था। माना जाता है कि 88 हजार संतों की यह तपोभूमि है। महर्षि सूत ने यहीं बैठकर भगवत कथा भक्तों को सुनाई थी और वेद व्यास ने यहीं बैठकर महाभारत की रचना की थी। और-तो-और घर-घर में सुनाई जानेवाली सत्यनारायण की कथा भी वेदव्यास ने यहीं रची थी। यजुर्वेद के सर्जक महर्षि वैशंपायन ने नैमिषारण्य में ही वेद व्यास के साथ वटवृक्ष के नीचे बैठकर तपस्या की थी। इनकी साधना का ही फल है कि एक दिव्यप्रकाशपुंज आज भी वटवृक्ष के चारों ओर घूमता हुआ भक्तों को दिखाई दे जाता है। इस वटवृक्ष के नीचे खड़े होकर मन की मुराद मांगनेवाले की मुराद पूरी होती है, इस दिव्यप्रकाशपुंज की पूजा करने से रोग और शोक दोनो दूर हो जाते हैं। और समस्याओं का समाधान हो जाता है। इसी वटवृक्ष के नीचे बनी है- व्यास गद्दी। यहीं बैठकर व्यासजी ने चारों वेदों का वर्गीकरण का कार्य संपादित किया था। वाष्कल ने ऋग्वेद,जैमिनि ने सामवेद, वैशंपायन ने यजुर्वेद और आरुणी ने अथर्ववेद का संपादन किया। शास्त्रों को छह भागों में विभक्त करने का तथा पुराणों में बिखरी असंख्य कथाओं को अठारह पुराणों में बांटने का काम भी महर्षि व्यास ने इसी नैमिषारण्य के वटवृक्ष के नीचे बैठकर किया था। इन पुराणों में पांच विषयों का विश्लेषण है इसलिए इन्हें पंचलक्षण भी कहते हैं। सर्गश्च,प्रतिसर्गश्च वंशो मनवंतराणि च वंशानुचरित चैवपुराणम पंच लक्षणम।
18 पुराण इस प्रकार हैं- ब्रह्म पुराण,पद्म पुराण,वैष्णव पुराण,शैव पुराण,भागवत पुराण,मार्कंडेय पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण,स्कंद पुराण,वामन पुराण,मत्स्य पुराण, गरुड़ पुराण, वराह पुराण, लिंग पुराण,आग्नेय पुराण, चात्र पुराण,कौर्म पुराण, भविष्य पुराण और प्रौक्त पुराण। ऐसा माना जाता है कि अपने अज्ञातवास के दौरान पांडव भी नैमिषारण्य आए थे। पवित्र पांडवों की गुफा इस बात का प्रमाण है। व्यास ने यहीं अपने प्रिय शिष्य लोमहर्षण को पुराणों की शिक्षा दी और यहीं बैठकर लोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा ने अपने शिष्यों को महाभारत की कथा सुनाई थी। स्कंद पुराण में तो पवित्र नैमिषारण्य की बड़े ही विस्तार से चर्चा की गई है। भक्त कवि सूरदास और आदि शंकराचार्य ने भी इस पवित्र भूमि में आकर साधना की थी। नैमिषारण्य को नैमिषारण्य क्यों कहा जाता है इसपर एक सुभाषित है कि-
यतस्तु निमिर्षणेदं निहित दानवं अरण्येअस्मिन ततस्तेन नैमिषारण्य संज्ञितम। श्रीमद्भागवत में भी नैमिषारण्य के संबंध में श्लोक है-
नैमिशे अनिमेष क्षेत्रे ऋषियः सौनिकां दियाह
सतसम सर्वज्ञ लोक या सहस्त्र समाम अस्ता। (श्रीमद्भागवतम1.1.4)
नैमिशे वन नैमिषारण्य,अनिमेष क्षेत्रे। ऐसी भी मान्यता है कि नैमिषारण्य का नामकरण नैमिषारण्य इसलिए पड़ा है क्योंकि यह भगवान विष्णु का सबसे प्रिय क्षेत्र है। और विष्णु भगवान पलक नहीं झपकाते हैं इसलिए यह क्षेत्र नैमिषारण्य कहलाया। ऋषि सौनक ने सौनक सहस्त्रम की रचना भी यहीं की। और ईश्वर के लिए,सर्वज्ञ ईश्वर के लिए जिन्होंने अपना सर्वस्व त्याग दिया, जो स्वर्ग में समाहित हैं, जो इस लोक में भक्तों द्वारा पूजित है और एक हजार शास्त्रों की रचना कर जो निरंतर प्रभु के संपर्क में है उन्होंने अपने सृजन के लिए इसी पवित्र भूमि को अपनी साधना स्थली बनाया था। महाभारत,सत्यनारायण की कथा,रामायण,रामचरित मानस और पुराणों में वर्णित यह नैमिषारण्य,मिमसार,निमसार और निमखार के नाम से भी जाना जाता है. लखनऊ से 89 कि.मी. दूर सीतापुर जिले में यह नैमिषारण्य स्थित है। नैमिषारण्य नैमित्तिक है। यानीकि इसका सृजन निमित्त विशेष के लिए हुआ, इसलिए भी यह नैमिषारण्य कहलाता है। यह हमें नैमिष होने का भी बोध काराता है यानीकि यह जीवन निमिषभर का है हमें यह बतलाता है। यह षम् है। षम् यानीकि वह पवित्र वन स्थली,जहांकि ऋषि,मुनि निवास करते हैं। यह नेमि है। नेमि यानीकि वज्र। वज्र को नेमि कहते हैं। महर्षि दधीचि की अस्थियों से वज्र यहीं बनाया गया था। नेम का एक अर्थ समय भी होता है। निमिष पल है। इसतरह नैमिषारण्य अरण्य है,वन है, उद्यान है और आराम है। संस्कृत में आराम का मतलब भी उद्यान होता है। आराम का अर्थ प्रसन्नता भी होता है। आत्माराम। इंद्रियाराम। तो जिस वन में,जिस उद्यान में आत्मा को प्रसन्नता मिले वह आराम ही नैमिषारण्य है। राम का आराम नैमिषारण्य है। वेद की नेमि नैमिषारण्य है। काल यहां नेमि बनके अवतरित होता है। जब तक संसार में वेद रहेंगे,रामचरितमानस रहेगा,पुराण रहेंगे,शास्त्र रहेंगे महाभारत की कथा रहेगी नैमिषारण्य का गौरव तब तक इस संसार में जीवित रहेगा।
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ब्रह्माजी के पास पहुंचे तो उन्होंने इन्हें इसी पवित्र नैमिशारण्य में निवास करने को कहा था। सूत की गद्दी वही जगह हैं जहां बैठकर सूतजी ने 88 हजार संतों को भागवत कथा सुनाई थी।
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नैमिषारण्य
पंडित सुरेश नीरव
भारतीय साहित्य में अरण्यों का उल्लेख खूब हुआ है। पुराण,वेद,महाभारत,रामायण से लेकर रामचरितमानस तक न जाने कितनें अरण्य अपने आंचल में कितनी-कितनी रोचक कथाएं समेटे हुए हैं। इन अरण्यों का उल्लेख साहित्य में होना इस बात का प्रतीक है कि हमारी संस्कृति का मूल स्त्रोत अरण्य ही रहे हैं। ये अरण्य सिर्फ जंगल नहीं थे। बल्कि हमारी सभ्यता और संस्कृति के जीवंत केन्द्र थे। चेतना की यज्ञशाला थे। अरण्य,आश्रम, और यज्ञ इनकी त्रयी से मिलकर ही बना है हमारा सांस्कृतिक वांड्ग्मय। अरण्य वन है तो अरणि यज्ञ में प्रयुक्त होनेवाली लकड़ी। अरणि का विस्तार अरण्य में देखती है भारतीय मनीषा। अरण्य वन की विकसित स्थिति है। वन में दैत्य और राक्षस भी रहते रहे हैं। जो ऋषियों को उनके धार्मिक अनुष्ठान में उत्पात मचाकर पीड़ित करते रहे हैं। इनके दमन के लिए देवताओं को ऋषियों की ओर से रण करना पड़ता था। दुष्टात्माओं के वध के बाद जिन क्षेत्र में रण की कोई संभावना नहीं रह जाती है उस वन को ही अरण्य कहा जाता है। अरण्य ही अभयारण्य थे। जहां रण न होकर सिर्फ मेल-मिलाप हो। आध्यात्मिक विकास के लिए पूजा,प्रार्थनाएं, योग, ध्यान और यज्ञ हों। जहां भय नहीं अभय की व्याप्ति हो। अरण्य में हवन करते थे ऋषि और संत। वन करने का अर्थ है निवास करना। जहां ऋषि तपस्या के लिए निवास करते हों वही तपोवन है। जहां शांति मुद्रा में ऋषि विश्राम करें वही शांतिवन है। जहां बैठकर प्रकृति और ऋतुओं का मधुपान हो वही मधुवन है। वन का एक अर्थ पूजा भी है। इसीसे बनता है स्तवन। वनस्थली ही पूजा स्थली है। वन का अर्थ प्रार्थना करना भी है। वन का अर्थ याचना करना भी है। जो कि सकाम है। वनुते जलम। उसने जल की याचना की। इस तरह वन निष्काम भी है और सकाम भी। वानप्रस्थी बनकर साधु,संत वन को ही महिमामंडित करते रहे हैं। श्रीकृष्ण तो कहलाते ही वनमाली थे। वनमाला पहनते थे और वृंदावन में विचरते थे। वन से इतना प्रेम था वनमाली श्रीकृष्ण को कि उन्होंने जो द्वारिका बसाई उसे भी वनमालिनी ही नाम दिया। वन, शिक्षा के सुविकसित केन्द्र हुआ करते थे। राजा अपने पुत्रों को वन स्थित आश्रमों में ही पढ़ने भेजते थे। राम,लक्ष्मण ने वन जाकर ही शिक्षा गृहण की थी। वन पुत्रों की वीरता के आगे नागर संस्कृति के योद्धा पानी भरते थे। लव-कुश वन पुत्र ही थे। राजा दुष्यंत के पुत्र भरत जंगलों में शेरों के बीच ही रहकर पले थे। जिनके नाम से इस देश का नाम भारत पड़ा। ये वीर वन पुत्र राक्षसों के आतंक से वनों को मुक्त कराते थे। और ऋषियों को अपने धार्मिक अनुष्ठान के लिए अरण्य प्रदान करते थे। ऋषियों को ऐसे अरण्यों की हमेशा तलाश रहती थी। वायुपुराण में ऋषियों ने ब्रह्माजी से ऐसे ही निरापद स्थान की याचना की थी। कहते हैं कि ऋषियों ने मानव कल्याण और विश्वशांति के लिए निर्बाध यज्ञ करने के लिए एक ऐसे ही भूखंड की मांग की थी जहां कलयुग का तनिक भी प्रभाव न हो और ऋषियों को निर्बाध पूजा का परिवेश मिल सके। ऋषियों की प्रार्थना सुनकर ब्रह्माजी ने तत्काल मनोमयचक्र की सृष्टि की और इसे भगवान शिव को अर्पित करते हुए पृथ्वी पर फेंक दिया। ब्रह्माजी ने ऋषियों को बताया कि यह चक्र जिस जगह पर जाकर रुकेगा वह भूमि ही तपस्या के लिए उचित भूमि होगी। ऋषि-मुनि उस चक्र के पीछे-पीछे दौड़ते रहे। हजारों मील की यात्रा के बाद यह मनोमाया चक्र ऐसे स्थान पर आकर रुका जहां एक विशाल पहिए के आकार का वन फैला हुआ था। संस्कृत में पहिए को नेमि कहते हैं और जंगल को अरण्य इसीलिए इस वन का नाम नैमिषारण्य पड़ गया। कहा जाता है कि ब्रह्माजी का मनोमाया चक्र इस भूमि पर इतने वेग से गिरा कि गिरने के स्थान पर एक जलस्त्रोत फूट पड़ा। शिव के लिंग की आकृति में जलधार इतनी तेजी से बह रही थी कि सारा अरण्य ही जलमग्न होने लगा। ऋषि-मुनि व्यग्र हो प्रभु से प्रार्थना करने लगे। करुणामयी प्रभु ने भक्तों की प्रार्थना सुन मदद के लिए मां ललिता को प्रथ्वी पर भेजा। शक्तिरूपा मां प्रकट हुईं। और उन्होंने अनियंत्रित जल को सोखकर नियंत्रित कर दिया। चक्र के गिरने से जो कुंड बना वही चक्रकुंड कहलाया। इस चक्रकुंड तीर्थ का बड़ा महत्व है। इस चक्रकुंड को पृथ्वीमंडल का केन्द्र माना जाता है। ब्रह्मा के मनोमाया चक्र के गिरने से शिवलिंग की आकृति में निकली जलधार आस्था का अमृत स्त्रोत है। ऋषि श्रृंगी,महर्षि उद्दालक,शिकमकेतु और महर्षि प्रवण ने सतयुग में यहीं निवास किया था। मान्यता है कि यहां के जल में स्नान करने से आत्मा पवित्र हो जाती है। दान करने से धन में वृद्धि होती है। आरोग्य की कामना करने से आरोग्य लाभ होता है। रोगों का तुरंत निवारण होता है और पिंडदान करने से सहज ही मोक्ष प्राप्त हो जाता है। अथर्वान के पुत्र दधीचि धर्म का महत्व समझकर यहां राजा से ऋषि बन गए थे। कथा है कि वृत्र नामक राक्षस जब बहुत शक्तिशाली हो गया तो शक्ति पाकर वह निरंकुश हो गया। उसके आतंक से ऋषि-मुनियों को यज्ञ करने भी मुश्किल हो गए। इसकी मिरंकुशता कितनी बढ़ गई होगी इसका अंदाज इसीसे लगाया जा सकता है कि उसने इंद्र को भी परास्त कर यहां से खदेड़ दिया था। ऋषि-मुनियों के साथ स्वयं इंद्र त्राहिमाम-त्राहिमाम करते हुए विष्णु की दरबार में गुहार लगाने जा पहुंचे। और मदद की याचना की। दूरदर्शी विष्णु ने रहस्योदघाटन किया कि वृत्रासुर ब्राह्मण है। यह किसी साधारण हथियार से नहीं मारा जा सकता है। उसके वध के लिए हमें एक ऐसे वज्र का निर्माण करना होगा जो किसी तेजस्वी ऋषि की अस्थियों से बना हो।
इसके लिए किसी महान ऋषि की अस्थियां चाहिए। विष्णु का यह प्रस्ताव सुनकर तमाम ऋषि अपनी अस्थियां देने को तैयार हो गए। तब विष्णु ने कहा कि इस कार्य के लिए सिर्फ महर्षि दधीचि ही उपयुक्त पात्र हैं। ऋषि समुदाय महर्षि दधीचि के पास पहुंचा और उन्हें भगवान विष्णु का संदेश सुनाया। महर्षि ने हर्षभरे स्वर से कहा, कि मुझे प्रसन्नता होगी यदि मेरा शरीर धर्मरक्षा के लिए काम आएगा। सभी प्राणियों को एक-न-एक दिन यह शरीर त्यागना ही पड़ता है। मेरी मृत्यु के बाद मेरा शरीर भी मिट्टी में मिल जाएगा। इससे बड़ा मेरा और क्या सौभाग्य होगा कि मेरा शरीर धर्म की रक्षा के काम आएगा। यह कहकर महर्षि चक्र-तीर्थकुंड की ओर बढ़ गए। वहां उन्होंने स्नान किया,पूजा की और फिर स्वेच्छा से अपनी अस्थियों का दान करने के लिए धर्म-तुला पर बैठ गए। इंद्र ने उनकी अस्थियों से गदा का निर्माण करवाया। यह वज्र असाधारण था। इस वज्र में धर्म के लिए प्राणोत्सर्ग करवेवाले महर्षि की अस्थियां प्रयुक्त हुईं थीं। इस धर्मयुद्ध में देवताओं की विजय हुई। नृशंस वृत्तासुर मारा गया। और देवताओं को उनका खोया हुआ वैभव वापस मिला। ऋषियों को अपने पूजा-पाठ के लिए निर्बाध वातावरण मिला। इस तरह नैमिषारण्य साक्षी बना महर्षि दधीचि के अनुपम त्याग का। इस नैमिषारण्य को बनने से पहले ही डूबने से बचानेवाली मां शक्तिरूपा ललिता का मंदिर भी यहीं है। जो देश के सिद्ध शक्तिपीठों में से एक है। मां ललिता ने न केवल नैमिषारण्य को डूबने से ही बचाया बल्कि जब महिषासुर नामक राक्षस ने इस क्षेत्र में अपना आतंक फैलाया तो देवताओं की प्रार्थना पर शक्तिरूपा मां ललिता ने भीष युद्ध कर महिषासुर का वध कर नैमिषारण्य को भयमुक्त कर दिया। इसी कारण इनको महिषासुरमर्दनी भी कहा जाता है। त्रेता युग में भी नैमिषारण्य का महत्व रहा है। रामचरितमानस में तुलसीदासजी ने नैमिषारण्य की विस्तार से चर्चा की है। एक कथा यह भी है कि मनुष्य के आदिपूर्वज मनु महाराज और उनकी धर्मनिष्ठ पत्नी सतरूपा ने पच्चीस हजार वर्ष तक कठिन तपस्या की। उनकी इस अप्रतिम साधना से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने इनसे कोई वरदान मांगने को कहा। कहते हैं कि तब मनु महाराज ने ब्रह्माजी को अपने यहां पुत्ररूप में जन्म लेने का वरदान मांगा। ब्रह्माजी ने मनु को वरदान देते हुए कहा कि त्रेतायुग में मैं तुम्हारी यह इच्छा पूरी करूंगा। तुम्हारी पत्नी सतरूपा कौशल्या बनेगी और तुम दशरथ। मैं राम के रूप में तुम्हारे राज्य अयोध्या में पुत्ररूप में जन्म लेकर तुम्हारी मनोकामना पूरी करूंगा। मनु और सतरूपा ने यह उग्र तपस्या नैमिषारण्य में ही की थी। त्रेतायुग का एक और प्रसंग नैमिषारण्य को लेकर प्रचलित है। कहा जाता है कि लंकेश रावण के भाई अहिरावण ने राम और लक्ष्मण का अपहरण कर लिया और वह उनकी बलि चढ़ाने पाताल लोक ले जा रहा था। मकरध्वज ने हनुमानजी को मार्ग बदलने के लिए विवश कर दिया। इसी नैमिषारण्य में हनुमानजी ने अहिरावण का वध किया था। और राम और लक्ष्मण को कंधे पर बैठाकर सुरक्षित यहीं ले आए थे। लाते क्यों नहीं यह नैमिषारण्य बना ही ब्रह्माजी के मनोमाया चक्र से ङै। और भगवान राम के रूप में ही ब्रह्माजी ने जन्म लिया था।
रामायण और रामचरितमानस का एक और प्रसंग नैमिषारण्य से जुड़ा हुआ है। कथा है कि धोबी के कहने पर जब भगवान राम ने सीताजी की अग्नि परीक्षा ली तो वह व्यथित होकर बाल्मीकि आश्रम में आकर रहने लगीं। यहीं उन्होंने लव-कुश को जन्म दिया था। आगे चलकर जब राम ने अश्नमेघ यज्ञ किया तो लव-कुश ने इनका घोड़ा रोक लिया। भीषण युद्ध हुआ। वीर बालकों ने हनुमानजी को भी पकड़ कर पेड़ से बांध दिया। सीताजी को जब यह बात पता चली तो वह काफी व्यथित हुईं। मान्यता है कि सीता का जन्म धरती से हुआ था। धरती ही उनकी मां थी। सीता ने धरती मां से गुहार की कि वह उन्हें अपनी कोख में समो ले। और... धरती ने उनकी प्रार्थना सुन सीताजी को अपने अंक में समा लिया। यह धरती में समाने की घटना भी नैमिषारण्य में ही हुई थी। जिस जगह यह घटना हुई थी वहां आज भी सीताकुंड बना हुआ है। नैमिषारण्य के नाम के पीछे नेमि के अलावा निमिष शब्द भी जुड़ा हुआ है। ऐसा माना जाता है कि गौरमुख नामक एक पहुंचे हुए ऋषि ने महा हाहाकारी एक दैत्य को एक निमिष में यानी कि एक पल में इसी अरण्य में जलाकर राख कर दिया था। इसलिए भी इस अरण्य को नैमिषारण्य कहा गया है। महाभारत के युद्ध के बाद जब दुखी ऋषिगण ब्रह्माजी के पास पहुंचे तो नैमिषारण्य को तपोभूमि बनाने का निर्देश उन्होंने ही दिया था। माना जाता है कि 88 हजार संतों की यह तपोभूमि है। महर्षि सूत ने यहीं बैठकर भगवत कथा भक्तों को सुनाई थी और वेद व्यास ने यहीं बैठकर महाभारत की रचना की थी। और-तो-और घर-घर में सुनाई जानेवाली सत्यनारायण की कथा भी वेदव्यास ने यहीं रची थी। यजुर्वेद के सर्जक महर्षि वैशंपायन ने नैमिषारण्य में ही वेद व्यास के साथ वटवृक्ष के नीचे बैठकर तपस्या की थी। इनकी साधना का ही फल है कि एक दिव्यप्रकाशपुंज आज भी वटवृक्ष के चारों ओर घूमता हुआ भक्तों को दिखाई दे जाता है। इस वटवृक्ष के नीचे खड़े होकर मन की मुराद मांगनेवाले की मुराद पूरी होती है, इस दिव्यप्रकाशपुंज की पूजा करने से रोग और शोक दोनो दूर हो जाते हैं। और समस्याओं का समाधान हो जाता है। इसी वटवृक्ष के नीचे बनी है- व्यास गद्दी। यहीं बैठकर व्यासजी ने चारों वेदों का वर्गीकरण का कार्य संपादित किया था। वाष्कल ने ऋग्वेद,जैमिनि ने सामवेद, वैशंपायन ने यजुर्वेद और आरुणी ने अथर्ववेद का संपादन किया। शास्त्रों को छह भागों में विभक्त करने का तथा पुराणों में बिखरी असंख्य कथाओं को अठारह पुराणों में बांटने का काम भी महर्षि व्यास ने इसी नैमिषारण्य के वटवृक्ष के नीचे बैठकर किया था। इन पुराणों में पांच विषयों का विश्लेषण है इसलिए इन्हें पंचलक्षण भी कहते हैं। सर्गश्च,प्रतिसर्गश्च वंशो मनवंतराणि च वंशानुचरित चैवपुराणम पंच लक्षणम।
18 पुराण इस प्रकार हैं- ब्रह्म पुराण,पद्म पुराण,वैष्णव पुराण,शैव पुराण,भागवत पुराण,मार्कंडेय पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण,स्कंद पुराण,वामन पुराण,मत्स्य पुराण, गरुड़ पुराण, वराह पुराण, लिंग पुराण,आग्नेय पुराण, चात्र पुराण,कौर्म पुराण, भविष्य पुराण और प्रौक्त पुराण। ऐसा माना जाता है कि अपने अज्ञातवास के दौरान पांडव भी नैमिषारण्य आए थे। पवित्र पांडवों की गुफा इस बात का प्रमाण है। व्यास ने यहीं अपने प्रिय शिष्य लोमहर्षण को पुराणों की शिक्षा दी और यहीं बैठकर लोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा ने अपने शिष्यों को महाभारत की कथा सुनाई थी। स्कंद पुराण में तो पवित्र नैमिषारण्य की बड़े ही विस्तार से चर्चा की गई है। भक्त कवि सूरदास और आदि शंकराचार्य ने भी इस पवित्र भूमि में आकर साधना की थी। नैमिषारण्य को नैमिषारण्य क्यों कहा जाता है इसपर एक सुभाषित है कि-
यतस्तु निमिर्षणेदं निहित दानवं अरण्येअस्मिन ततस्तेन नैमिषारण्य संज्ञितम। श्रीमद्भागवत में भी नैमिषारण्य के संबंध में श्लोक है-
नैमिशे अनिमेष क्षेत्रे ऋषियः सौनिकां दियाह
सतसम सर्वज्ञ लोक या सहस्त्र समाम अस्ता। (श्रीमद्भागवतम1.1.4)
नैमिशे वन नैमिषारण्य,अनिमेष क्षेत्रे। ऐसी भी मान्यता है कि नैमिषारण्य का नामकरण नैमिषारण्य इसलिए पड़ा है क्योंकि यह भगवान विष्णु का सबसे प्रिय क्षेत्र है। और विष्णु भगवान पलक नहीं झपकाते हैं इसलिए यह क्षेत्र नैमिषारण्य कहलाया। ऋषि सौनक ने सौनक सहस्त्रम की रचना भी यहीं की। और ईश्वर के लिए,सर्वज्ञ ईश्वर के लिए जिन्होंने अपना सर्वस्व त्याग दिया, जो स्वर्ग में समाहित हैं, जो इस लोक में भक्तों द्वारा पूजित है और एक हजार शास्त्रों की रचना कर जो निरंतर प्रभु के संपर्क में है उन्होंने अपने सृजन के लिए इसी पवित्र भूमि को अपनी साधना स्थली बनाया था। महाभारत,सत्यनारायण की कथा,रामायण,रामचरित मानस और पुराणों में वर्णित यह नैमिषारण्य,मिमसार,निमसार और निमखार के नाम से भी जाना जाता है. लखनऊ से 89 कि.मी. दूर सीतापुर जिले में यह नैमिषारण्य स्थित है। नैमिषारण्य नैमित्तिक है। यानीकि इसका सृजन निमित्त विशेष के लिए हुआ, इसलिए भी यह नैमिषारण्य कहलाता है। यह हमें नैमिष होने का भी बोध काराता है यानीकि यह जीवन निमिषभर का है हमें यह बतलाता है। यह षम् है। षम् यानीकि वह पवित्र वन स्थली,जहांकि ऋषि,मुनि निवास करते हैं। यह नेमि है। नेमि यानीकि वज्र। वज्र को नेमि कहते हैं। महर्षि दधीचि की अस्थियों से वज्र यहीं बनाया गया था। नेम का एक अर्थ समय भी होता है। निमिष पल है। इसतरह नैमिषारण्य अरण्य है,वन है, उद्यान है और आराम है। संस्कृत में आराम का मतलब भी उद्यान होता है। आराम का अर्थ प्रसन्नता भी होता है। आत्माराम। इंद्रियाराम। तो जिस वन में,जिस उद्यान में आत्मा को प्रसन्नता मिले वह आराम ही नैमिषारण्य है। राम का आराम नैमिषारण्य है। वेद की नेमि नैमिषारण्य है। काल यहां नेमि बनके अवतरित होता है। जब तक संसार में वेद रहेंगे,रामचरितमानस रहेगा,पुराण रहेंगे,शास्त्र रहेंगे महाभारत की कथा रहेगी नैमिषारण्य का गौरव तब तक इस संसार में जीवित रहेगा।
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