Search This Blog

Tuesday, September 7, 2010

जय नैमिषारण्य जयलोकमंगल।

आदरणीय नीरवजी,
नैमिशारण्य पर आपकी पोस्ट पढ़ी। आपने लिखा है कि ब्रह्मजी ने साधु-संतो को पूजा-पाठ के लिए नैमिषारण्य की भूमि दी जोकि निर्विघ्न थी आपने तो आरण्य और अरण्यों की चर्चा करके इस ब्लाग को ही अभयारण्य बना दिया है जहां हम सभी लोग अभय-निर्भय होकर रमण कर सकते हैं। यह भी एक तीर्थ ही है।  जहां भगवान हैं,हंस हैं.. सुरेश हैं.. और तमाम देवी-देवता विचरते हैं। जय नैमिषारण्य जयलोकमंगल।
रजनीकांत राजू

No comments: