बंधुवर रजनीकांत राजूजी.
आपकी पोस्ट पढ़ी। आपने,मेरे व्यंग्य की समीक्षा करते हुए इसे एक जारूक रचनाकार-पत्रकार की अभिव्यक्ति बताया है। इस टिप्पणी के लिए आभारी हूं। मगर आप भी कम सतर्क और जागे हुए नहीं है,जो अदलती व्यस्तताओं के बाद ब्लाग पर अपनी हाजिरी नियमित लगा रहे हैं वह भी बिना पेशकार के। हाजिरी पर तारीख रहने का अपना मजा है। अंग्रेजी में इसे ही डेटिंग कहते हैं। डेटिंग के मामले में आपका ट्रैकरिकार्ड बचपन से ही उम्दा रहा है और आज तलक बरकरार है। इस जोश को बनाए रखिए। लोगों को आपसे प्रेरणा मिलेगी।
जय लोक मंगल।
पंडित सुरेश नीरव

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