पार्दर्शी संवेदना से लैस एक जागरूक कविता
दया निर्दोषी की कविता मौन बहुत ही पार्दर्शी संवेदना से लैस एक जागरूक कविता है जो हमें मानवीय मूल्यों के निर्धारण के लिए प्रेरित-उत्प्रेरित करती है। कविता वही है जो लिखनेवाले को और पढ़नेवाले को दोनों को ही सुख और आनंद प्रदान करे। इस दिशा में दयाजी की कविता इस कसौटी पर खरी उतरती है। मैं चाहूंगा कि वह जल्दी-से-जल्दी जयलोकमंगल की सदस्य बनें। जैसे विश्वविद्यालय कुछ लोगों को मानद डीलिट देते है वैसे ही मानद सदस्य तो हम दयाजी को पहले से मानते ही हैं। अब औपचारिक सदस्यता भी वे ले-ही-लें।
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मैं भगवानजी के कमंडल का जल हूं।
श्री भगवानसिंह हंसजी ने अपने शब्दों के कमंडल में भावना का जो गंगाजल भर रखा है, उसके दो-चार छींटे ही पूरे गंगा स्नान का आनंद दे देते हैं। इसी को कहते हैं- जो मन चंगा तो कठौती में गंगा। उनका मन चंगा है। इसलिए वो साधारण जल को भी गंगा जल कर देते हैं। मैं भगवानजी के कमंडल का जल हूं। बस। और कुछ नहीं...।
मेरे पालागन...
पंडित सुरेश नीरव
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