आदरणीय नीरवजी मेरे नमन स्वीकार करें। श्री नीरवजी आपके प्रश्न एक गूढ़ बिषय से संबंधित हैं जिनका उत्तर देना सरल नहीं है। धर्म मनुष्य की सोच से परे एक पराकाष्ठ है जो मनुष्य के प्रण/वचन की अनुभूति बनकर एक विश्वास हाशिल करती है और उसमें वह एक साकार रूप देखता है जहाँ उसकी जिज्ञासा सत्य का ही प्रतिबिम्ब देखती है और वही सत्य उसका मंगलकारी होता है तथा वही सत्य उसकी मुक्ति का कारक भी बनता है जिसके लिए यदि उसको निर्जल उपवास भी करना पड़े तो वह सहर्ष करता है। यही उसकी आस्था है और इसलिए ही वह आस्थानवत हो जाता है , श्रद्धानवत हो जाता है और ध्यानानवत हो जाता है जिसके लिए उसको शराव या मांस क्या, जल भी वर्जित है। ऐसे ही मंगलवार जो हनुमान का दिन है , मंगल /आनंद का दिन है ,को जो लोग उसमें आस्था रखते हैं/ श्रद्धा रखते हैं, नाख़ून न काटना, बाल न कटवाना आदि को बहिष्कृत कर देते हैं। इसके पीछे यह भी एक मान्यता हो सकती है जैसाकि आपने बताया कि हनुमान स्वयं सोमरस का पान करते थे ऐसा वाल्मीकि रामायण में लिखा है । परन्तु हनुमानजी ने केवल मंगलवार को शराव पीना छोड़ रखा हो। शेष दिनों में वे सोमपान करते हों। अतः कुछ प्राप्त करने के लिए त्याग तो अपरिहार्य है, यही धर्म की पराकाष्ठा है , यही धर्म है और यही सत्य है। यह सत्य ही हनुमान है एवं हनुमान ही परमपिता परमेश्वर है।
आदरणीय नीरवजी आपने यह एक ऐसा बिषय चुना है जो अपने आप में एक अलग पहिचान बनता है और जो साहित्य एवं कला से भी अलग है। ऐसे सोच/विचार के लिए मैं आपको बार-बार बधाई देता हूँ।
जय लोकमंगल। योगेश
No comments:
Post a Comment