
संदर्भः श्रीविश्मोहन तिवारी का आलेख-
हर रोज दिन निकलता है। हर दिन रात होती है। हमें इस दिन और रात के बीच ही जिंदगी को सजाना और संवारना है। इस दिनऔर रात के अहसास को रूह में उतारनेवाला कौन है ।और कौन है जिसके उजालों से ये आँखों के दिए, दिन-रात जलते हैं। और कौन है वे लोग जो इन उजालों के साए में अतीत के धुंध में से यथार्थ का मोती ढ़ूंढ़ लाते हैं। कहां का शंबूक और कहां के राम। आज इन सरोकारों पर कुछ कहना सांप्रदायिकता के जुमले को अपने पर चस्पा करवाने का जिन्हें शौक हो सिर्फ वही कह सकते हैं। लेकिन फिर भी कुछ लोग है जिन्हें धारा के विरुद्ध चलने का हुनर आता है। श्री विश्वमोहन तिवारी ऐसी ही एक शख्सियत हैं। जिन्होंने इतिहास के चहरे से साजिशों का नकाब हटाया है। यकीनन शंबूक का प्रकरण भगवान राम को छोटा करने का एक कुत्सित प्रयास था जिसे लोग बिना सोचे-समझे ढोने लगे। ऐसे मजाक हिंदू धर्म के ही साथ ही संभव हैं। वरना सिर काट देने के फतवे कब के जारी हो जाते। और सर कट भी जाते। आलेख हमें सचाई की रोशनी से रू-ब-रू कराता है। इसीलिए..
क्या ख़बर कब वो चले आएँगे मिलने के लिए
रोज़ पलकों पे नई शम्में जलाया कीजे।
हमें अपनी आंखें खोलकर चीजों की,तथ्यों की पड़ताल और संभाल करनी चाहिए। अच्छे आलेख के लिए विश्वमोहनजी साधुवाद के पात्र हैं।
-मधु मिश्रा
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