हम को दुश्मन की निगाहों से न देखा कीजे
प्यार ही प्यार हैं हम, हम पे भरोसा कीजे।
चंद यादों के सिवा हाथ न कुछ आएगा
इस तरह उम्रे-गुरेजां का न पीछा कीजे।
रौशनी औरों के आँगन में गवारा न सही
कम से कम अपने ही घर में तो उजाला कीजे।
क्या ख़बर कब वो चले आएँगे मिलने के लिए
रोज़ पलकों पे नई शम्में जलाया कीजे।
रईस अख्तर
प्रस्तुति- मृगेन्द्र मक़बूल
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