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Wednesday, October 20, 2010

अच्छा लगता है

 हास्य-ग़ज़ल-हास्य-ग़ज़ल-हास्य-ग़ज़ल-हास्य-ग़ज़ल
मौसम में बरसात के सब अच्छा लगता है
हरजाई  का झूठा वादा भी सच्चा लगता है 

क्यों आंसू ढ़ुलकाते हो तुम उसके दिए फरेब पर
अपनों से ही यार हमेशा गच्चा लगता है

वो कैसे साथ निभाता तेरे जीवन में
जो दिखने में  चालचलन में कच्चा लगता है

झूठ-फरेब भुलाकर सारी दुनिया के
बात उसूलों की करता वो बच्चा लगता है 
रिश्वत की दौलत से हासिल सूट से 
फटाफटाया  अच्छा हमको  कच्छा लगता है।
पंडित सुरेश नीरव
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