प्रशांत योगीजी ने एक स्त्री जो नितंग नंगा नहाती है का द्रष्टान्त देकर अपने यथार्थ दर्शन का बोध कराया है कि उस स्त्री के नंगे नहाने को मत देखो क्योंकि लज्जा स्त्री का गहना है बल्कि गहराई में उतरकर देखो। उसका नंगापन दिखाई नहीं देगा बल्कि आपको यथार्थता का दर्शन होगा। यहाँ पर दोनों ही स्थितियों में चाहे स्त्री के नग्नरूप को देखना या उसकी गहराई में उतरकर देखना , मन संलग्न है अर्थात मन दोनों ही रूपों में सक्रिय है। मन की सक्रियता चंचल होती है। मन की सक्रियता का चंचल होना कभी भी गहराई में नहीं उतर सकता है। जब मन गहराई में नहीं उतर सकता है तो यथार्थ का दर्शन होना बड़ा दुर्लभ है।
वहीँ पंडित सुरेश नीरवजी ने - तोरा मन दर्पण कहलाए - के माध्यम से तर्क दिया है कि एक आदमी नंगा नहा रहा था तो दुसरे आदमी को शर्म आई तो उसने अपना कपड़ा उतार कर उसको दे दिया और खुद नंगा हो गया । उसने की तो भलाई परन्तु वह स्वयं बेशर्म बन गया। यहाँ उसका मन सक्रिय है। शर्म भी है और बेशर्म भी है यहाँ उसका मन संलग्न है। जहाँ मन सक्रिय होता है वहां विकार पैदा होता है और जहाँ विकार पैदा होता है वहाँ काम , क्रोध और लोभ का प्रादुर्भाव होता है। आदिवासी कन्याएं नग्न रहती हैं ,वहाँ कोई लज्जा नहीं है क्योंकि वहाँ उनका नहीं है इसलिए किसी तरह का विकार नहीं है । विकार न गन्दा है और न साफ़ है। जहाँ मन होता है वहीँ लोग कपडे का इस्तेमाल करते हैं चाहे कपडे कैसे भी हों - गेरुए , पीले आदि । वहाँ उसके मन में विकार है कि महावीर हो या दिगम्बर इत्यादि । बच्चा निर्मन होता है। जब वह निर्मन है तो उसके अन्दर कोई विकार ही नहीं है ,जब विकार नहीं है तो वह निर्मन बच्चा मग्न है क्योंकि उसको दुनियादारी का पता ही नहीं है इसलिए उसको न काम है, न क्रोध और न कोई लोभ है। उसका मन नहीं है इसलिए वह कुछ नहीं देखता है । यही सत्य है , यही शाश्वत है और यही सनातन है अर्थात यही सत्य दर्शन है। उसी को मेरे नमन।
-भगवान सिंह हंस
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