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Monday, November 15, 2010

बृहद भरत चरित्र महाकाव्य

कैकेयी-एक विदुषी पटरानी
गौरवर्ण शोभित सब अंगा। म्रगलोचन चन्द्रमुख उमंगा। ।
सौष्ठाव्य वपु सुग्रीवा सोहे। अनुपम कंगन कर-कर मोहे । ।
राजा दशरथ की छोटी पटरानी कैकेयी का गौरवर्ण है उससे उसके सब अंग सुशोभित हैं। कैकेयी का म्रगलोचन और चंद्रमुख है। उसका गठीला शरीर और सुन्दर ग्रीवा बहुत लालायित कर रही हैं और कैकेयी के दोनों हाथों में अनुपम कंगन मन को लुभा रहे हैं।
झुमकी हस्तफूलहि निहारा। मंगलसूत्र लसित उद्गारा। ।
टीका झलहि जस रविप्रभाता। पीटवसन सोहे सब गाता। ।
महारानी कैकेयी के कानों में झुमकी और उसके हाथ में हथफूल कितने सुन्दर लग रहे हैं। उसके गले में पड़ा मंगलसूत्र उसके उदगार को और भी सुशोभित कर रहा है। उसके माथे पर झलता टीका रवि प्रभात की तरह बहुत शोभित हैऔर पीले वस्त्र कैकेयी के गात पर चार चाँद लगा रहे हैं।
रचयिता- भगवान सिंह हंस
प्रस्तुति-अमित

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