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Thursday, November 25, 2010

अब, सोने दो दोनों को !














मैं एक रूहानी किताब हूँ ! मुझे पता नहीं  मेरा नाम क्या है ! मुझे किसी चांदनी रात में पढना ,.....मस्जिदों-मंदिर की  सोच से ऊपर उठकर  !...केवल मेरी बे-नजीर खूबसूरती निहारना  ! ..किसी पूर्णमासी  की रात  में ,जब चाँद भी योवन पर हो , भूल जाना मेरे रचनाकार को ,.....केवल  मुझे देखना ,अर्ध-निर्लिप्त  ,.....और पूछना खुद से ........"क्या मेरे मर-मरी पन्नों पर  मजहबों की  कम-ज़र्फ़  सोच  के सुर्ख छींटे  अच्छे लगेंगे ?".............प्रशांत योगी 
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