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Thursday, November 11, 2010

मुक्तक



महज विस्तार ही विस्तार तो अंबर नहीं होता
बुझाए न जो प्यास प्यासों की न जो सरवर नहीं होता
नहीं माँ, बाप की ममता, दुआओं का बसर जिसमें;
महल वह भव्य हो सकता है, पर वो घर ही नहीं होता

बिठाया पीठ पर अपनी मनुज से बन गया घोड़ा
सहीं कठिनाईयां कितनी न तुझको कष्ट हो थोड़ा
तुझे अंगुली पकड़, चलना सिखाया था कभी जिसने;
उसे चलना हुआ दूभर, तो तुने रह में छोड़ा

न मन के भाव हों सुन्दर तो, तन सुन्दर नहीं होता
जहां हों कामनाएं, प्रेम का परिसर नहीं होता
जो ढँकने के बहाने से उघाड़े और भी ज्यादा;
वो गज भर रेशम कपड़ा कभी चुनर नहीं होता

ये माटी मात्न-भू की तुम मेरे माथे लगा देना
घुटे जो साँस मेरी, दोस्त दामन की हवा देना
मिले रण में शदाहत जो मुझे, इतना भला करना;
हैं खाए घाव छाती पर मेरी माँ को बता देना


डॉ. मधु चतुर्वेदी
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