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Wednesday, November 17, 2010

अकाल का ही भरोसा



आदरणीय नीरवजी का हास्य-व्यंग्य -काल के गाल में अकाल -इतना सटीक , सशक्त एवं अन्वेशानात्मक है कि इस पर कुछ कहना मेरे लिए दुर्लभता ही होगी या यों कहिए कि नव अंकुरित कुल्हा कहीं सहज हवा के झोंके से अति महीन धूल के कणों से अकाल ही न कुचल जाए। जब सब कुछ अकाल में समा गया था यानी कुछ भी अवशेष नहीं था तो वहां पर केवल काल ही शेष रह गया था। जब उस अकाल में काल का निवेश भी नहीं रहा तो यह निश्चित हो गया कि अब काल के गाल (घर) में भी अकाल पड गया। पंडितजी ने निष्कर्षतः सही ही कहा है कि अकाल का ही भरोसा है। क्योंकि आज ग्लोबलाइजेशन में सब कुछ काल के गाल में अकाल ही नष्ट हो गया है। पहले तीनों काल सामयिकरूप से भौतिकवादी, अध्यात्मिकवादी और सांस्कारिकवादी हुआ करते थे। इसलिए ही स्कूल के दिनों में मास्साब रट्टा लगवा लगवाकर याद कराते थे। उनकी एक अलग महत्ता थी। परन्तु इस ग्लोबलाइजेशन में वे तीनों काल यानि भूत, वर्तमान और भविष्य बाजारूकाल बन चुके हैं अर्थात उन्होंने अनेक वैराइटियों से युक्त मुखौटा पहन लिया है। इसलिए ही आज काल ट्रंककाल , मिसकाल, एलार्मकाल , हाक्सकाल,जैकाल, कालगर्ल, कालबाय, कालहसबेंड, कालवाइफ चाहे प्रातः काल हो , सांयकाल हो या रात्रिकाल हो, के रूप में आकर काल खुद घंटी बजाता है। अब रट्टा लगाने की या प्रशिक्षण देने की कतई गुंजाइश नहीं रह गयी है। सब कुछ ऑब्जेक्टिव हो गया है। सरदार कालसिंह ने सही कहा है । उनकी कालवाइफ का मौलिक या प्रामाणिक अर्थ बताने की आवश्यकता ही नहीं रह गयी। पंडितजी ने आधुनिक पर्यावरण पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि सावन के अंधे को सब कुछ हरा ही नज़र आता है। सरदार कालसिंह की बात को पुख्ता करते हुए पंडितजी कहते हैं कि धुलने के वाद कपड़े और शादी के वाद पत्नी अपने असली रूप में आते हैं। पंडितजी ने स्कूली मास्साब से लेकर सरदार कालसिंह और उसके दादाजी के जरिए वर्तमान सामाजिकीय पर्यावरण के नग्नरूप पर करारा व्यंग्य किया है। इस बाजारू काल ने हमारी सांस्कारिक धरोहर, ईमानदारी, लिवास, निवास ,चाल-ढाल, व्यावहारिक पर्यावरण और सम्बन्ध-रिश्ते आदि सब इस काल के गाल में अकाल ही समा गए हैं। इसका पता भूत, वर्तमान और भविष्य काल के सी बी आई के तीनों सेक्शन लगा रहे हैं क्योंकि अब यमदूत यानी महाकाल का नहीं बल्कि किसी अकाल का ही भरोसा रह गया है जो आकर कब सतश्री करे और कहे जिससे यह आधुनिक पर्यावरण पुनर्संरचना करके अपना मौलिक एवं सांस्कारिक लिवास ओड़ लेय। पंडित सुरेश नीरवजी को गहरी टीस है इस अकाल बिगड़ती हुई व्यवस्था पर। परन्तु उनको पूरा यकीन है, पूरा भरोसा है कि इसका पर्दाफास भी अकाल ही होगा। पंडित सुरेश नीरवजी ने एक दुर्लभ शीर्षक से स्कूली मास्साब और एक नहीं दो सरदारों के माध्यम से आज के समाज का बिगड़ता हुआ हुलिया और अपना द्रढ़ विश्वास हमें बताया है। पंडितजी की मौलिक शब्दावली और उनके ऐसे द्रढ़ विश्वास को साधुवाद देता हूँ और उन्हें प्रणाम करता हूँ। जय लोक मंगल।
भगवान सिंह हंस
मो० -9013456949
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