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Friday, November 12, 2010

क्या हम किसी कट्टरपंथी वैचारिक विस्फोट का इंतजार कर रहे हैं,

 श्रद्धेय तिवारीजी,
 आज प्रौद्योगिकी की जो ताकत बढ़ी है,उसकी उपमा भारतीय मिथकों में वर्णित भस्मासुर से ही की जा सकती है। हमसे ही शक्ति प्राप्त कर आज हमारे ही अस्तित्व को मिटाने का काम इसके द्वारा किया जा रहा है। लेकन सोचनीय मुद्दा यह भी है कि सबकुछ जानने के बाद भी शिव का तीसरा नेत्र क्यों नहीं खुल रहा। हम इसकी ताकत के आगे मंत्रबिद्ध पशु की तरह लाचार क्यों हैं। सब जानने के बाद भी हमारी परंपराएं और हमारे मूल्यों के साथ यह अंतहीन और क्रूर मजाक कब तक जारी रहेगा। हमारे खान-पान,आचार-विचार, भाषा और संस्कृति को किश्तों में खत्म किया जा रहा है। ऐसे में क्या सेंसर की कोई उपयोगिता रह गई है या कि फिर किसी कट्टरपंथी वैचारिक विस्फोट का इंतजार कर रहे हैं,हमारे हुक्मरान। आपने इन पंक्तियों में जो मूल्य विनाश का खाका खींचा है,वह काबिले गौर है। हमारी सरकार और बुद्धिजीवियों को समय रहते चेतना ही होगा।
 ताज्जुब है कि ये खिलवाड़ मानव के कल्याण के लिए बनी  निष्प्राण प्रौद्योगिकी द्वारा ही किया जा रहा है। टीवी तथा पेज थ्री पर फैशन मॉडलों, पॉप आर्टिस्टों, फिल्मी एक्टरों आदि तथाकथित सैलिब्रिटी को बढ़ाया जाता है। इन सभी का भोगवाद के अर्थात अनावश्यक भोग की वस्तुओं के 'सैक्सी' विज्ञापन के लिये उपयोग किया जाता है। ऐसे में प्रौद्योगिकी जीवन पर हावी होती है, हमारी सोच को भ्रष्ट करती है। प्रौद्योगिकी तेजी से बदल रही है और बदली भी जा रही है। इसके फलस्वरूप नित नए उत्पाद आने के कारण समाज में अस्थिरता बनी रहती है, विचार तेजी से पुराने होते जाते हैं। नई संतति को पुरानी से कतराना सिखलाया जा रहा है, वह उपयोगी परम्पराओं से भी कटती जाती है। और इस तरह हजारों वर्षों की विवेकपूर्ण सांस्कृतिक विरासत, सीखे गये व्यवहार और सिद्धान्तों का उपयोग नहीं हो पाता जोकि मानव को पशुता के निकट ले जाते हैं। इसमें क्या आश्चर्य कि आज समाज अपनी अनव्याही तथा एकल माताओं जैसी समस्याओं को हल करने में अक्षम पाता है, ऐसे अनेक उदाहरण हैं। आज के बढ़ते हुए अमानवीय अपराध इस निष्कर्ष की पुष्टि करते हैं कि आधुनिक प्रौद्योगिकी के दुष्परिणाम भोगवाद की मदद से ही पैदा हुए है। यदि हमारी दृष्टि भोगवादी नहीं होगी तब हम अमानवीय प्रौद्योगिकी पर नियंत्रण रख सकेंगे। यदि हम भोगवाद नहीं चाहते तब हमें अपनी भाषाओं में ज्ञान और विज्ञान की शिक्षा लेना चाहिये।
एक बहुत विचारोत्तेजक आलेख के लिए मैं आपकी लेखनी को प्रणाम करता हूं। 
पंडित सुरेश नीरव 
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