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Sunday, February 6, 2011

आजादी के संग्राम का सनातन स्मारक

श्री राजमणिजी
आप देश के स्वतंत्रता सेनानियों के तीर्थ स्थल सेलुलर जेल से होकर लौटे हैं। जहां तमाम देशभक्तों की यातना गाथाएं वहां की हवाओं में आज भी तैरती हैं। अंडमान निकोबार हमारी आजादी के संग्राम का सनातन स्मारक है। बलिदान और आत्म गौरव से लवरेज वादियों की खुशबू से आपने जयलोकमंगल ब्लॉग को भी सुगंधित कर दिया है। और वसंत से पहले ही वसंत ला दिया है। मेरा रंग दे बसंती चोला की अमर धुन एक बार फिर जागृत हो गई। इस पुण्य कार्य हेतु आपको अनेक साधुवाद
पंडित सुरेश नीरव

Friday, February 4, 2011

क्यों मंहगा है पेट्रोल


एक दिन पेट्रोल न खरीदने पर ४.६ अरब डॉलर का तेल कंपनियों को एक दिन में घाटा होगा। और उनके पास अपने भंडार में दूसरी किस्त खरीदने का पैसा भी नहीं होगा। तभी इनके समझ में आएगा कि ये जनता को कैसे लूट रहे थे और अब जानता जाग चुकी है...
IT HAS BEEN CALCULATED THAT IF EVERYONE DID NOT PURCHASE A DROP OF
PETROL FOR ONE DAY AND ALL AT THE SAME TIME, THE OIL COMPANIES WOULD
CHOKE ON THEIR STOCKPILES.


AT THE SAME TIME IT WOULD HIT THE ENTIRE INDUSTRY WITH A NET LOSS
OVER 4.6 BILLION DOLLARS WHICH AFFECTS THE BOTTOM LINES OF THE OIL
COMPANIES.
THEREFORE "
Feb.14 th" HAS BEEN FORMALLY DECLARED

"STICK IT UP THEIR BEHIND " DAY AND THE PEOPLE OF THIS NATION SHOULD
NOT BUY A SINGLE DROP OF PETROL THAT DAY।

अपनी ताकत दिखाएं ..सरकारी कालाबाजारियों को झुकाएं

ओपीचांडाल

मैं डाबरमैन से मैन बन गया हूं



जयलोकमंगल पर मैंने पोस्ट एक लिखी और भूचाल गया। अभिषेक मानवजी ने मुझे अपना दत्तक पुत्र मानकर मुझे डाबरमैन से मैन बना दिया। पंडित सुरेश नीरव ने मुझे जयलोकमंगल का सदस्य ही बना दिया। और सिद्ध कर दिया कि जैसे आदमियों में कुछ कुत्ते होते हैं वैसे ही कुत्तों में भी कुछ आदमी होते हैं जिन्हें मानव ही पहचान पाते हैं। मेरे को मानवजी ने प्यार दिया तो आजादी के मतवाले जगदीश परमार की भी बांछें खिल गईं। मैं समय-समय पर जयलोकमंगल के अपने भाई-बहनों को चाटूंगा और कभी-कभी काटूंगा भी। हाल फिलहाल आप सभी को मेरी प्यार भरी भौं-भौं..
आपका बफादार
ईशू

मानव तुम सचमुच मानव हो




आदरणीय इशु मानव की जय,
कौन कहता है की आप डॉग हैं । आज से अभिषेक मानव ने आप को अपने बेटे की तरह गोद ले लिया .क्योंकि किसी भी जीव की पहचान उसके मन से होती है और आज आपने जो कहा है वो मानव शरीर में रहने वाले जंतु सोच भी नहीं सकते .आप निश्चित रूप से पूर्व जन्म में महात्मा रहे होंगे.आप ने पेट्रोल के माध्यम से जो कहने का प्रयास किया है उसको सत्ताधारी लोग सुन लें तो उनको पेट्रोल लग जाएगा .इशु मानव आप दुनिया के सबसे बड़े कवि .पत्रकार ,लेखक ,नेता ,शिक्षक ,देशभक्त ,और मानवपुत्र हैं.इश्वर आपको दीर्घायु करें ।
आपका
अभिषेक मानव

आज जयलोकमंगल पर अभिषेक मानव का पत्र पढ़ा। मन को बहुत आनंद मिला। आनंद मजा नहीं होता है। जिस करुणा के साथ व्यंग्य करते हुए संदेश देने का काम उन्होंने किया है,वह प्रशंसनीय है। मेरे लिए डॉक्टर मधु,मंजुऋषि और अरविंद पथिक ने जो स्नेह दिया है मैं उसका आभार मानता हूं। पंडित सुरेश नीरव ने यह सब कराया है,आप सब से मिलवाया है,मैं आप सबके जज्बात उन तक पहुंचाता हूं। मेरे प्रणाम..
जगदीश परमार

आज का चिट्ठा

डॉक्टर मधु चतुर्वेदी-
आपका गीत बहुत अच्छा लगा। जो भी पढ़ेगा उसे लगेगा जैसेकि ये गीत उसी के लिे ही लिखा गया हो। मुझे भी पढ़कर ऐसा लगा जैसे ये गीत मेरे लिए ही आपने लिखा हो। मैं भी  ऐसा ही  एक पथिक हूं।हो सकता है मेरा अंदाज सही हो. और अगर गलत फहमी हो तो भी दिल को बहलाने के लिए  एक खूबसूरत मुगालता है। गीत की यही सफलता है कि जो पढ़े उसे अपना-सा लगे। उसे लगे कि कुछ उसके लिए कहा जा रहा हा। बधाई...
इच्छित रंग भरो जीवन में,
तुम्हीं समय के कुशल चितेरे|
सूर्य कोटिश: दीप्त नयन में,
अंधियारे का फिर भय क्या?
पंथी, पथ से परिचय क्या?
                      श्री अरविंद पथिकजी,
आप अनुभूतियों के अक्ष पर खड़े होकर गीत लिखते हैं और चुटकुलेबाजों को धमकाते भी हैं कि नापने की जुर्रत न करें। वो क्या आप को नापेंगे खुद ही नप जाएंगे। बेचारे.. यूं ही लिखते रहिए और दिखते रहिए..

अनुभूतियों के अक्ष पर होकर खडे लिखता हूं गीत
हां ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌समय के वक्ष पर होकर खडे लिखता हूं गीत
चुटुकुलों के मानकों से मापने की जुर्रत न कर,,
मैं वेदना के कक्ष मे होकर खडे लिखता हुं गीत
कोई कान्धा न मिला सिर रखने को
अपने ही तकिये पर सिर टिका कर रो दिए

सुश्री मंजुऋषिजी,
नर्म-नर्म खयालातों से लवरेज आपका गीत पढ़ा। मन गीत-गीत हो गया। रचना में बेकसी और तनहाई दोनों का बड़ा मार्मिक चित्रण है। इसे पढ़कर ही तो कहना पड़ता है कि मन के भी होता है मन..
अपने ही दिल को तसल्ली देने को
अपनी ही आँखों से आँसूं छलका कर रो दिए

कोई कान्धा न मिला सिर रखने को
अपने ही तकिये पर सिर टिका कर रो दिए

न सहलाया उस पर भी जब किसी ने ग़मगीन माथा
अपनी ही उंगली बालों में फिरा कर सो गए ....

आज ईशू की भौं-भौं भी सटीक लगी.. 
श्री भगवानसिंह हंसजी
मेरे अटूट शुभचिंतक हैं और सचमुच ही वे मुझे बहुत पहले ही ब्रह्मऋषि होने का वरदान दे चुके थे। भगवान के वरदान भला कब झूठे हो सकते हैं। वे अपने हंस-हृदय से ऐसी ही कृपावर्षा करते रहें,यही कामना है..
पंडित सुरेश नीरव 

Wednesday, February 2, 2011

समकालीन सरोकारों को रेखांकित करने की तकनीक

भाई अभिषेक मानवजी.
आपकी विचारोत्तेजक पोस्ट पढ़ ली। खूब मजा आ रहा है। मैं पढ़ रहा हूं यह इस बात का सबूत है कि मैं मानव को पढ़ रहा हूं। मानव को पढ़ने के लिए मानव का मन और मानव की दृष्टि बहुत जरूरी है, जो इत्तफाक से मेरे भी पास है। पौराणिक पर्तीकों के जरिए समकालीन सरोकारों को रेखांकित करने की तकनीक आपके पास है। जो जन्मजात होती है। मेरी बधाई... इन पंक्तियों मैं बहुत जान है-
इनसे ज्यादा आदर्शवादी तो मैं रावण को मानता हूँ. लक्ष्मण को शक्ति-बाण लगने पर उसकी लंका से ही वैद्य सुषेन आए. रावण ने विजय और धर्म में धर्म को चुना. उसकी सत्ता में जितना अधर्म था उतना ही आज भी है. रावण की बहन का तो नाक कान काट लिया गया. क्या यह आधुनिक भारत में आधी दुनिया के साथ बदतमीजी नहीं है ? राम मनुष्य होते तो छुपकर बाली की हत्या नहीं करते, आमने-सामने युद्ध करते. ये कौन सा आदर्श है – ”जेहिं विधि होय नाथ हित मोरा” ! वह यह भी कहता कि सीता ने ही कौन सा इतना बड़ा आदर्श निभा दिया कि उसे सती बोला जा रहा है ! लक्ष्मण के रेखा खींचने के बाद भी वह भाग गयीं रावण के साथ, क्योंकि उसे जंगल नहीं रावण का राज महल चाहिए था. सुख चाहिए था, जंगल में सुख कहाँ था ! यह सब सुनकर राम को दुःख तो बहुत होता था परन्तु सीता....
जयलोक मंगल..
पंडित सुरेश नीरव

आप पहंचे हुए संत है


पंडित सुरेश नीरवजी,
कभी पढ़ा था कि- जैं-जैं पांव पड़ें संतन के तैं-तैं बंटा ढार। आप सचमुच मैं पहुंचे हुए संत हैं क्योंकि पहले ाप धर्मशाला गे तो वहां करमापा कांड हो गया फिर आप इजिप्त गए तो वहां बगावत हो गई। संत वही है जो सोए हुे समाज को जगाए। आपने दोंनों जगह अपनी उपस्थिति से ये काम कर दिया। आप महान हैं। पहुंचे हुए संत हैं। आप को कोटि-कोटि प्रणाम। बस हमारी दिल्ली पर कृपा दृष्टि बनाए रखें। आपसे यही विनती है।
भाई अरविंद पथिक का ऐतिहासिक काव्य पढ़ रहा हूं। बिस्मिलजी पर इतनी अच्छी काव्य रचना मैंने आज तक नहीं पढ़ी। पथिकजी की लेखनी में ओज है। इन पंक्तियों मैं काफी-कुछ है-
ग्वालियर राज्य से चलकर के बिस्मिल के बाबा आये थे
कुछ खट्टी - मीठी स्मृतियां,अपने संग लेकर आये थे

उन दिनो देश मे था अकाल ,दुर्भिक्ष बडा भयकाररी था
शासन सोया था निद्रा मे अमला सब अत्या चारी था
थी मिली नौकरी मुश्किल से रूपये बस तीन ही मिलते थे
बच्चों के कोमल भाव देख ,पंडितजी अक्सर डिग जाते थे

आ लौट चलें अपने घर को ,कहते कहते रुक जाते थे
श्रम धैर्य देखकर पत्नी का , दुख दर्द सभी सह जाते थे।
ओमप्रकाश चांडाल

Tuesday, February 1, 2011

लोकतंत्र में राम

श्री  अभिषेक मानव का व्यंग्य लोकतंत्र में राम पढ़ा। मिथकीय चरित्रों को लेकर समकालीन परिस्थितियों पर व्यंग्य करना एक गहरा और गंभीर काम है। आज की राजनीति को बेनकाब करता उनका व्यंग्य सोचने को मजबूर करता है कि राजनीति आज किस तरह चरित्रहीन हुई है। जातिवाद के जहर ने उसे किस तरह अपंग बना दिया है । आज की राजनीति का मूल ध्येय मेरे एक शेर में शायद सिमट गया है-
हर मुकम्मिल आदमी को अब हराया जाएगा
और जो आधे-अधूरे सब यहां चल जाएंगे..
पंडित सुरेश नीरव

नीरवजी पालागन



डॉ.जगदीश परमारजी का गीत पढ़ा मन को बहुत सुख मिला। एक तपे हुए परमार को एक नवोदित परमार का शाही सलाम.. पंडित सुरेश नीरवजी हमेशा बड़ा काम करते हैं उन्होंने आपको( जगदीश परमार को) जयलोकमंगल का सदस्य बनाकर एक पुण्य कार्य किया है। मैं उनके प्रति श्रद्धावनत आजन्म रहूंगा।

परमारजी के गीत की ये पंक्तियां बहुत अच्छी लगी-

मेरा तो कुछ नहीं गीत में

मेरा तो कुछ नहीं गीत में

जो भी है सभी तुम्हारा है

जैसी अनुभूति हुई वैसी

मन कागज़ उसे उतारा है

लिखता कौन लिखाता को है

कलम नहीं जब लिख पाती है

नाद विचरता नाभि सिंधु

जब शब्द शक्ति यह लिखवाती है

मुकेश परमार

शब्दों के जादूगर हैं नीरवजी


पंडित सुरेश नीरव ने मुझे जयलोकमंगल का सदस्य बनाकर जिंदा कर दिया है। मैं सोनजुही उतरी अपने गीत संग्रह से गीत लिखता रहूंगा इस तरह मेरा मन है। बाकी प्रभु की इच्छा। ब्लॉग देख रहा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। काफी लोग लिख रहे हैं। मंजुऋषि की रचनाएं और अरविंद पथिक की रचना ने मन को मोहा। हंसजी की भाषा बहुत ही पवित्र ओर मासूम है। डॉक्टर मधु को पुरस्कार के लिए बधाई। मभिषेक मानव का लोकतंत्र में राम लेख बहुत अच्छा लगा। नीरवजी का संस्मरण बहुत ही रोचक लगा। वो तो शब्दों के जादूगर हैं। चाहे गद्य लिखें या पद्य उनकी लेखनी कमाल करती है। मेरे आशीर्वाद उनके साथ हैं।
जगदीश परमार

Monday, January 24, 2011

धर्म और क्षेत्रीयता से बड़ा है संगीत



आद्यात्म की सुगंध से महकता आपका आलेख पढ़ा। जिसने बड़ा आनंद दिया। संगीत सुख नहीं आनंद में होना सिखाता है। संगीत के सात सुर सात समुद्र पार भी अपने अर्थ नहीं खोते हैं। इसलिए इन्हें धर्म और क्षेत्रीयता से बड़ा माना गया है। आपने ठीक कहा है-
वायु प्राण है ,क्यों कि सांसों की सरगम में भी वायु ही है !अगर वायु नहीं तो प्राण कहाँ ?सांसों का रेचक - कुम्भक ही संगीत-मय प्राण के आरोह और अवरोह हें ! प्रकृति का सबसे अनूठा वरदान है संगीत ! गहरे अर्थों में संगीत ही प्रकृति है जो मनुष्य की कृत्रिम धारणायों और अव-धारणायों की जंजीरें तोड़ता है !प्रकृति के संगीत में गहरे उतरे तो ध्यान अवश्य घटेगा !आत्मा का योग परमात्मा से होगा !धर्म, जाति ,वर्ग और सम्प्रदायों की दीवारें गिरेंगी ,प्रेम का उद-भव होगा !प्रेम के संगीत में डूबे तो मनुष्य में केवल मनुष्य को देख पायोगे !वेद की ऋचाएं में मोहम्मद और कुरान की आयतों में बुद्ध के दर्शन कर पायोगे !आत्मा के संगीत का अनुसरण किया तो खोखली परम्परायों की बेड़िया टूटेंगी !
डॉक्टर प्रेमलता नीलम

ब्रह्मांड भी एक लय में ही गति कर रहा है


 सुरेश नीरव-
 जीवन में संगीत है या संगीत में जीवन है। शायद दोनों ही एक दूसरे के अन्योन्याश्रित है। क्योंकि जिस प्रकृति के अंतर्गत जीवन है वह प्रकृति भी लयबद्ध है। और ब्रह्मांड भी एक लय में ही गति कर रहा है। कॉस्मास संगीत पृथ्वी को भी नचा रहा है-झुमा रहा है।एक अदृश्य लय है जो हमारी धमनियों-शिराओं में बजती रहती है। एक थिरक है हम सभी के भीतर। जिसमें प्राण है वह प्राणी है। हर प्राणी की एक विशिष्ट लय है। संगीत से साक्षात्कार अपनी आत्मा से बतियाना है।
 कैसा इत्तफाक है कि भीमसैन जोशी के देहांत पर आपने संगीत पर अपना आलेख डाला है। ये उन्हें एक सच्ची श्रद्दांजलि है।
"गीत से सराबोर व्यक्ति आत्मनुशाषित होता है !आत्मा के जागरण का विषय है संगीत !एक ऐसी विधा है संगीत जो मनुष्य को मनुष्यता के नज़दीक लाती  है !संगीत जीवन में प्राक्रतिक सहजता लाकर  कृत्रिम आवरण उतार देता है !एक विद्वान् संगीतज्ञ ने संगीत के सात स्वरों को स्रष्टि का आधार मानते हुए कुछ ऐसे आख्यायित किया है --"सा" से साकार ब्रह्म ,"रे" से ऋषी-मुनि ,"ग" से गन्धर्व ,"म" से महीपाल इंद्र ,"प"से प्रजा ,"ध" से धर्म और "नी"से निराकार ब्रह्म !"
सुरेश नीरव

Sunday, January 23, 2011

ऐसा शायद इसलिए होता है


 आज का शेर-

 रात के टुकड़ों पे पलना छोड़ दे
शम्अ से कहना के जलना छोड़ दे
मुश्किलें तो हर सफ़र का हुस्न हैं,
कैसे कोई राह चलना छोड़ दे।
वसीम बरेलवी 

प्रश्नः एक ही संदर्भ में भिन्न-भिन्न प्रतिक्रियाएं क्यों आती हैं...
सुरेश नीरव- आज श्री प्रशांत योगीजी ने पूछा है कि ऐसा क्यों होता है कि संदर्भ एक होते हैं मगर प्रतिक्रियाएं भिन्न क्यों होती हैं। तो इसमें मेरा मानना है कि अभिव्यक्ति मनुष्य के भाव संसार का उत्पाद है। एक कथा है कि-
एक राजा ने दो मजदूरों को एक साथ पत्थर तोड़ने की सजा दी। एक मजदूर बार-बार अपने भाग्य को कोस रहा था और कह रहा था कि मेरे तो भाग्य ही फूट गए। मुझे पत्थर तोड़ने पड़ रहे हैं। भगवान किस जन्म का बदला ले रहा है तू। दूसरा मजदूर कह रहा था कि भगवान मैं तेरा बड़ा आभारी हूं जो तूने मुझे पत्थर तोड़ने का मौका दिया। मैं इन पत्थरों के हर टुकड़े में तेरी ही तस्वीर देखता हूं। जितने पत्थर मैं तोड़ता हूं उतनी बार तेरी सूरत देखने को मिलती है। हर पत्थर का टुकड़ा तेरी मूर्ति है, यह मैंने आज ही जाना। मैं तेरा आभारी हूं..प्रभु.. जो तूने मुझे ये पावन अवसर प्रदान किया।
शिक्षा- जो काम आपको करना है वो करना ही है। चाहे हंस कर करो या रो कर। जिसका मन आभार से भरा है,अहो भाव से पूर्ण है उसकी प्रतिक्रिया हर कार्य में सारस्वत ही होती है। इसलिए एक ही संदर्भ में भिन्न-भिन्न प्रतिक्रिया आती ही हैं। यह मनुष्य का स्वभाव है और संस्कार भी।शायद इसलिए ऐसा होता है।
पंडित सुरेश नीरव

कई दिनों बाद एक अच्छा गीत पढ़ने को मिला

सुभाष जयंती-
आज भारत रत्न सुभाष चंद्र बोस का 114वां जन्मदिन है। सारे राष्ट्र की ओर से हम कृतज्ञ भारतवासी जयहिंद मंत्र के उदगाता को नमन करते हैं।
आदरणीय नीरवजी आपने नेताजी पर बहुत ही सार्थक लेख ब्लॉग पर लिखा है। आपको इस लेख के लिए और साथ-ही-साथ आपकी सफल विदेश यात्रा के लिए मेरी ओर से हार्दिक बधाई।
श्री बी.एल. गौड़ साहब का गीत बहुत सुंदर है। ये सही मायनों में गीत है। कई दिनों बाद एक अच्छा गीत पढ़ने को मिला।
जयलोकमंगल के सभी साथियों को पालागन..
ज्ञानेन्द्र चतुर्वेदी

यही रचना का धर्म और गीत का सौंदर्य है

आदरणीय गौड़ साहब,
आपका गीत जीवन के दर्शन को अभिव्यक्त करता एक ऐसा काव्यात्मक दस्तावेज है जहां एक फूल भी ज्ञान-योगी बनकर मनुष्य को जीवन जीने का सलीका और जीवन की क्षणभंगुरता दोनों का सनातन पाठ पढ़ा देता है। यही रचना का धर्म और गीत का सौंदर्य है। इन पंक्तियों में स्थावर और जंगम दोनों ही तत्वों का निरूपण हुआ है,वो भी सहजता के साथ..यह सहज ही ब्रह्म है।
मुझ से कहा था फूल ने
तू ध्यान दे इस बातपर
हैं जिंदगी के चार दिन
अंधियार की मत बात कर
तू झूमकर इसको बिता
तू जिंदगी के गीत गा
तू सौ बरस के साधनों की
भूल कर मत भूल कर

जब कदाचिन मा फलेषु
कर्म का औचित्य क्या
इस पार तो सब सत्य है
उस पार का अस्तित्त्व क्या
तू चोट कर भरपूर ऐसी
रूढ़ियों के मूल पर।
आप को साधुवाद..
पंडित सुरेश नीरव

श्रीवक्तृत्व क्षमता ने धूम मचाई है


आज का चिट्ठा

२३ जनवरी,2011

दो दिन अस्वस्थता वश अस्त-व्यस्त दशा में बीते| चलिए देर से ही सही पं. सुरेश नीरव को मिस्र-यात्रा की ऐतिहसिक सफलता हेतु हार्दिक बधाई| भारतीय राजदूत द्वारा वहाँ उनका विशेष तौर पर सम्मान किया जाना जहां एक उल्लेखनीय घटना है वही उनकी वक्तृत्व तृत्व क्षमता ने जो धूम मचाई है, वह श्लाघनीय है| उन्हें पुन: अनेकश: बधाईयां| श्री विश्वमोहन तिवारीजी के प्रश्न, विचार-मंथन को प्रेरित कर सार-नवनीत ग्रहण करने का उपाधान हैं| योगी जी अपने लेखों में लीक से हटकर कुछ क्रांतिकारी सन्देश देने की प्रशंसनीय चेष्टा करते हैं|

डॉक्टर नागेश पांडेयजी का गीत भावपूर्ण एवं हृदय स्पर्शी है, बधाई! अरविन्द पथिक की प्रस्तुति भी श्लाघनीय है|

श्री बीएल गौड़ साहब के युवा भतीजे के आकस्मिक निधन का समाचार हृदय विदारक है| मेरी सम्पूर्ण चेतना संवेदनामय हो गई है| ईश्वर उन्हें व उनके परिवार को यह दारुण-दु:ख सहने की सामर्थ्य दे|

योगीजी, आपसे फोन पर बातें होंगी| मेरी खिन्नता को आप समझ नहीं पाए| मैं इस पर भी खिन्न हूँ|

ब्लॉग पर * श्री भगवानसिंह हंसजी की नियमित उपस्थिति सुखद है|

अभिषेक मानव भी अपनी चुटीली अभिव्यक्तियों से ब्लॉग पर सक्रिय हैं, देखकर अच्छा लगा |

डॉ. मधु चतुर्वेदी

Saturday, January 22, 2011

आदरणीय पंडित सुरेश नीरवजी,
अपरिहार्य कारणों से एक लंबा अंतराल हुआ। क्षमाप्रार्थी हूं।
इसबीच काफी नए सदस्य बन गए। ज्ञानेन्द्र पांडेयजी,बीएल.गौड़ साहब और ललित गुप्ताजी। सभी का स्वागत।
श्री प्रशांत योगीजी की शिकायत जायज है। हम सभी एक लगाव महसूस करते हैं आपस में। और इसमें यदि कोई बहुत दिनों के लिए अनुपस्थित हो जाता है तो शिकवे-शिकायतें हो ही जाती हैं। मैं उनकी भावनाओं की कद्र करती हूं और कोशिश करूंगी कि अब नियमितता बनी रहे।
नीरवजी आपको अद्भुत सफल विदेश यात्रा के लिए बधाइयां। आपके आलेख ने गुदगुदी और ज्ञानरंजन के साथ शालीन मनोरंजन किया है। ये टुकड़ा तो लाजवाब है-
रास्तेभर उड़ती धूल और सड़कों पर फैली पोलीथिन थैलियों और बीड़ी-सिगरेट के ठोंठों को देखकर यकीन हो गया कि मिश्र की सभ्यता पर भारतीय सभ्यता की बड़ी गहरी छाप है। और नील नदी तथा गंगा नदी के बीच पोलीथिन का कूड़ा एक सांस्कृतिक सेतु है। नेहरू और नासिर की निकटता शायद इन्हीं समानताओं के कारण उपजी होगी। और निर्गुट देशों के संगठन का विचार इसी रमणीक माहौल को देखकर ही इन महापुरुषों के दिलों में अंकुरित हुआ होगा।
दिल्ली के सरकारी क्वाटरों के उखड़े प्लास्टर और काई खाई पुताई से सबक लेकर इजिप्तवासियों ने मकान पर प्लास्टर न कराने का समझदारीपूर्ण संकल्प ले लिया है। यहां मकान के बाहर सिर्फ ईंटें होती हैं।प्लास्टर नहीं होता। पुताई नहीं होती। दिल्ली की तरह मेट्रो यहां भी चलती है।लाइट और सड़कों के मामले में इजिप्त दिल्ली से आगे है।
जयलोक मंगल...
डॉक्टर प्रेमलता नीलम

हमें प्रसन्नता है



आदरणीय नीरवजी,
आपकी सफल मिश्र यात्रा के लिए आपको बधाइयां। आप वहां सम्मानित हुए ये लेखनी का सम्मान है। हमें प्रसन्नता है कि आपने नील नदी की सभ्यतावाले देश में हिंदी कविता का प्रतिनिधित्व किया।
दया निर्दोषी

जी हाँ मैं घर बनाता हूँ


श्री बी.एल.गौड़ साहब,
आपकी रचना बहुत ही मार्मिक और संवेदनशील है। पढ़कर लगा कि सधी हुई लेखनी कविता में कैसे कमाल करती है। एक अच्छी रचना मन को बहुत ताजगी दे जाती है।
घर से कुकर की सीटी

स्नानघर से हरिओम तत्सत
पूजाघर से टनन टनन
आरती के स्वर
आँगन से बच्चों की धकापेल
दादा की टोका टाकी
उपरी मन से
दादी की कोसा काटी
और इसी बीच
महाराजिन का पूछना
"बीबीजी ! क्या बनाऊं ?"
जब तक यह सब कुछ नहीं
तब तक घर घर नहीं
मत कहना दोबारा
कि मैं घर बनाता हूँ
जी हाँ मैं घर बनाता हूँ।
आप को साधुवाद...
मुकेश परमार

मन गार्डन-गार्डन हो गया


आदरणीय नीरवजी,
खुद देतामिश्र यात्रा के संस्मरण पढ़कर मन प्रसन्न हो गया। वर्णन इतना सजीव है लगता है कि हम इजिप्त घूम रहे हों। और उसमें हास्य का पुट तो यात्रा वृतांत को और भी सजीव बना है। लेख पढ़कर मन गार्डन-गार्डन हो गया। इन पंक्तियों का तो जबाब ही नहीं है-
पिरामिड और ममियोंवाले इस देश की राजधानी केरों में एक अदद ग्रेवसिटी भी है। यानी कि कब्रों का शहर। जहां सिर्फ मुर्दे आराम फरमाते हैं। इनकी कब्रें मकान की शक्ल में हैं। जिसमें खिड़की और दरवाजे तक हैं। छत पर पानी की टंकी भी रखी हुईं हैं। और इन कब्रीले मकानों पर प्लास्टर ही नहीं पुताई भी की हुई है। मुर्दों के रखरखाव का ऐसा जलवा किसी दूसरे देश को नसीब नहीं। कब्रों की ऐसी शान-शौकत देखकर हर शरीफ आदमी का मरने को मन ललचा जाता होगा। ऐसा मेरा मानना है। यहां का म्यूजियम भी ममीप्रधान संग्राहलय है। हजारों साल से सुरक्षित रखी ममियां दर्शकों को हतप्रभ करती हैं। मन में प्रश्न उछलता है, इन निर्जीव शरीरों को देखकर कि अपना सामान छोड़ कर कहां चले गए हैं ये लोग। क्या ये वापस आंएंगे अपना सामान लेनें। हमारे यहां के सरकारी खजाने में किसी की अगर एक लुटिया भी जमा हो जाए तो उसे छुड़ाने में उसकी लुटिया ही डूब जाए। मगर इस मामले में इजिप्त के लोग बेहद शरीफ हैं। वो बिना शिनाख्त किए ही तड़ से किसी भी रूह को उसका सामान वापस लौटा देंगे। शायद इसी डर के कारण इनके मालिक अभी तक आए भी नहीं हैं। आंएंगे भी नहीं।
आपको अनेक बधाइयां
मुकेश परमार