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Sunday, January 23, 2011

ऐसा शायद इसलिए होता है


 आज का शेर-

 रात के टुकड़ों पे पलना छोड़ दे
शम्अ से कहना के जलना छोड़ दे
मुश्किलें तो हर सफ़र का हुस्न हैं,
कैसे कोई राह चलना छोड़ दे।
वसीम बरेलवी 

प्रश्नः एक ही संदर्भ में भिन्न-भिन्न प्रतिक्रियाएं क्यों आती हैं...
सुरेश नीरव- आज श्री प्रशांत योगीजी ने पूछा है कि ऐसा क्यों होता है कि संदर्भ एक होते हैं मगर प्रतिक्रियाएं भिन्न क्यों होती हैं। तो इसमें मेरा मानना है कि अभिव्यक्ति मनुष्य के भाव संसार का उत्पाद है। एक कथा है कि-
एक राजा ने दो मजदूरों को एक साथ पत्थर तोड़ने की सजा दी। एक मजदूर बार-बार अपने भाग्य को कोस रहा था और कह रहा था कि मेरे तो भाग्य ही फूट गए। मुझे पत्थर तोड़ने पड़ रहे हैं। भगवान किस जन्म का बदला ले रहा है तू। दूसरा मजदूर कह रहा था कि भगवान मैं तेरा बड़ा आभारी हूं जो तूने मुझे पत्थर तोड़ने का मौका दिया। मैं इन पत्थरों के हर टुकड़े में तेरी ही तस्वीर देखता हूं। जितने पत्थर मैं तोड़ता हूं उतनी बार तेरी सूरत देखने को मिलती है। हर पत्थर का टुकड़ा तेरी मूर्ति है, यह मैंने आज ही जाना। मैं तेरा आभारी हूं..प्रभु.. जो तूने मुझे ये पावन अवसर प्रदान किया।
शिक्षा- जो काम आपको करना है वो करना ही है। चाहे हंस कर करो या रो कर। जिसका मन आभार से भरा है,अहो भाव से पूर्ण है उसकी प्रतिक्रिया हर कार्य में सारस्वत ही होती है। इसलिए एक ही संदर्भ में भिन्न-भिन्न प्रतिक्रिया आती ही हैं। यह मनुष्य का स्वभाव है और संस्कार भी।शायद इसलिए ऐसा होता है।
पंडित सुरेश नीरव
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