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Friday, February 4, 2011

आज का चिट्ठा

डॉक्टर मधु चतुर्वेदी-
आपका गीत बहुत अच्छा लगा। जो भी पढ़ेगा उसे लगेगा जैसेकि ये गीत उसी के लिे ही लिखा गया हो। मुझे भी पढ़कर ऐसा लगा जैसे ये गीत मेरे लिए ही आपने लिखा हो। मैं भी  ऐसा ही  एक पथिक हूं।हो सकता है मेरा अंदाज सही हो. और अगर गलत फहमी हो तो भी दिल को बहलाने के लिए  एक खूबसूरत मुगालता है। गीत की यही सफलता है कि जो पढ़े उसे अपना-सा लगे। उसे लगे कि कुछ उसके लिए कहा जा रहा हा। बधाई...
इच्छित रंग भरो जीवन में,
तुम्हीं समय के कुशल चितेरे|
सूर्य कोटिश: दीप्त नयन में,
अंधियारे का फिर भय क्या?
पंथी, पथ से परिचय क्या?
                      श्री अरविंद पथिकजी,
आप अनुभूतियों के अक्ष पर खड़े होकर गीत लिखते हैं और चुटकुलेबाजों को धमकाते भी हैं कि नापने की जुर्रत न करें। वो क्या आप को नापेंगे खुद ही नप जाएंगे। बेचारे.. यूं ही लिखते रहिए और दिखते रहिए..

अनुभूतियों के अक्ष पर होकर खडे लिखता हूं गीत
हां ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌समय के वक्ष पर होकर खडे लिखता हूं गीत
चुटुकुलों के मानकों से मापने की जुर्रत न कर,,
मैं वेदना के कक्ष मे होकर खडे लिखता हुं गीत
कोई कान्धा न मिला सिर रखने को
अपने ही तकिये पर सिर टिका कर रो दिए

सुश्री मंजुऋषिजी,
नर्म-नर्म खयालातों से लवरेज आपका गीत पढ़ा। मन गीत-गीत हो गया। रचना में बेकसी और तनहाई दोनों का बड़ा मार्मिक चित्रण है। इसे पढ़कर ही तो कहना पड़ता है कि मन के भी होता है मन..
अपने ही दिल को तसल्ली देने को
अपनी ही आँखों से आँसूं छलका कर रो दिए

कोई कान्धा न मिला सिर रखने को
अपने ही तकिये पर सिर टिका कर रो दिए

न सहलाया उस पर भी जब किसी ने ग़मगीन माथा
अपनी ही उंगली बालों में फिरा कर सो गए ....

आज ईशू की भौं-भौं भी सटीक लगी.. 
श्री भगवानसिंह हंसजी
मेरे अटूट शुभचिंतक हैं और सचमुच ही वे मुझे बहुत पहले ही ब्रह्मऋषि होने का वरदान दे चुके थे। भगवान के वरदान भला कब झूठे हो सकते हैं। वे अपने हंस-हृदय से ऐसी ही कृपावर्षा करते रहें,यही कामना है..
पंडित सुरेश नीरव 
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