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Sunday, January 23, 2011

यही रचना का धर्म और गीत का सौंदर्य है

आदरणीय गौड़ साहब,
आपका गीत जीवन के दर्शन को अभिव्यक्त करता एक ऐसा काव्यात्मक दस्तावेज है जहां एक फूल भी ज्ञान-योगी बनकर मनुष्य को जीवन जीने का सलीका और जीवन की क्षणभंगुरता दोनों का सनातन पाठ पढ़ा देता है। यही रचना का धर्म और गीत का सौंदर्य है। इन पंक्तियों में स्थावर और जंगम दोनों ही तत्वों का निरूपण हुआ है,वो भी सहजता के साथ..यह सहज ही ब्रह्म है।
मुझ से कहा था फूल ने
तू ध्यान दे इस बातपर
हैं जिंदगी के चार दिन
अंधियार की मत बात कर
तू झूमकर इसको बिता
तू जिंदगी के गीत गा
तू सौ बरस के साधनों की
भूल कर मत भूल कर

जब कदाचिन मा फलेषु
कर्म का औचित्य क्या
इस पार तो सब सत्य है
उस पार का अस्तित्त्व क्या
तू चोट कर भरपूर ऐसी
रूढ़ियों के मूल पर।
आप को साधुवाद..
पंडित सुरेश नीरव
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