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Saturday, January 22, 2011

जी हाँ मैं घर बनाता हूँ


श्री बी.एल.गौड़ साहब,
आपकी रचना बहुत ही मार्मिक और संवेदनशील है। पढ़कर लगा कि सधी हुई लेखनी कविता में कैसे कमाल करती है। एक अच्छी रचना मन को बहुत ताजगी दे जाती है।
घर से कुकर की सीटी

स्नानघर से हरिओम तत्सत
पूजाघर से टनन टनन
आरती के स्वर
आँगन से बच्चों की धकापेल
दादा की टोका टाकी
उपरी मन से
दादी की कोसा काटी
और इसी बीच
महाराजिन का पूछना
"बीबीजी ! क्या बनाऊं ?"
जब तक यह सब कुछ नहीं
तब तक घर घर नहीं
मत कहना दोबारा
कि मैं घर बनाता हूँ
जी हाँ मैं घर बनाता हूँ।
आप को साधुवाद...
मुकेश परमार
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