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Saturday, January 22, 2011

आदरणीय पंडित सुरेश नीरवजी,
अपरिहार्य कारणों से एक लंबा अंतराल हुआ। क्षमाप्रार्थी हूं।
इसबीच काफी नए सदस्य बन गए। ज्ञानेन्द्र पांडेयजी,बीएल.गौड़ साहब और ललित गुप्ताजी। सभी का स्वागत।
श्री प्रशांत योगीजी की शिकायत जायज है। हम सभी एक लगाव महसूस करते हैं आपस में। और इसमें यदि कोई बहुत दिनों के लिए अनुपस्थित हो जाता है तो शिकवे-शिकायतें हो ही जाती हैं। मैं उनकी भावनाओं की कद्र करती हूं और कोशिश करूंगी कि अब नियमितता बनी रहे।
नीरवजी आपको अद्भुत सफल विदेश यात्रा के लिए बधाइयां। आपके आलेख ने गुदगुदी और ज्ञानरंजन के साथ शालीन मनोरंजन किया है। ये टुकड़ा तो लाजवाब है-
रास्तेभर उड़ती धूल और सड़कों पर फैली पोलीथिन थैलियों और बीड़ी-सिगरेट के ठोंठों को देखकर यकीन हो गया कि मिश्र की सभ्यता पर भारतीय सभ्यता की बड़ी गहरी छाप है। और नील नदी तथा गंगा नदी के बीच पोलीथिन का कूड़ा एक सांस्कृतिक सेतु है। नेहरू और नासिर की निकटता शायद इन्हीं समानताओं के कारण उपजी होगी। और निर्गुट देशों के संगठन का विचार इसी रमणीक माहौल को देखकर ही इन महापुरुषों के दिलों में अंकुरित हुआ होगा।
दिल्ली के सरकारी क्वाटरों के उखड़े प्लास्टर और काई खाई पुताई से सबक लेकर इजिप्तवासियों ने मकान पर प्लास्टर न कराने का समझदारीपूर्ण संकल्प ले लिया है। यहां मकान के बाहर सिर्फ ईंटें होती हैं।प्लास्टर नहीं होता। पुताई नहीं होती। दिल्ली की तरह मेट्रो यहां भी चलती है।लाइट और सड़कों के मामले में इजिप्त दिल्ली से आगे है।
जयलोक मंगल...
डॉक्टर प्रेमलता नीलम
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