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Thursday, December 16, 2010

मातमपुर्सी-पर्यटन


 हास्य-व्यंग्य-
शोकसभा का कुटीर उद्योग
पंडित सुरेश नीरव
आज सुबह-सुबह शोकसभानंदजी का हमारे मोबाइल पर अचानक हमला हुआ। मैं-तो-मैं, मेरा मोबाइल भी आनेवाली आशंका के भय से कराह उठा। शोकसभानंदजी की हाबी है उत्साहपूर्वक शोकसभा आयोजित करना। हर क्षण वह तैयार बैठे रहते हैं कि इधर किसी की खबर आए और उधर वे तड़ से अपनी शोकसभा का कुटीर उद्योग शुरूं करें। वैसे इनको जैसे ही किसी की बीमारी की खबर मिलती है,उनकी बांछे खिल जाती हैं। महीने में यदि पंद्रह से कम शोकसभाएं होती हैं तो खुद शोकसभानंदजी की तबीयत बिगड़ने लगती है। शोकसभाएं शोकसभानंदजी का प्राणतत्व है।  मजाल है कोई बड़ा आदमी बीमार पड़े,अस्पताल में भर्ती हो, और शोकसभानंदजी मातमपुर्सी-पर्यटन के लिए उसे देखने न जाएं। बीमार के घर या अस्पताल में आना-जाना शोकसभा के आयोजन का अचूक निवेश है। इससे एक बात की गारंटी हो जाती है कि शोकसभा का ठेका उसे ही मिलेगा और कोई दूसरा नहीं झटक पाएगा। वैसे क्या बताएं आजकल शोकसभा के कुटीर उद्योग में भी ब़ड़ी गला-काट प्रतियोगिता शुरू हो गई है। कई डिजायन के शोकसभानंदजी पूरी तैयारियों से लैस होकर शोकसभा इंडस्ट्री में कूद चुके हैं। मगर हमारे शोकसभानंदजी आज भी इस इंडस्ट्री के पहले पायदान पर डटे हुए हैं। और भगवान की कृपा से अपने कई प्रतिद्वंदियों की शोकसभाएं वे सफलतापूर्वक निबटा चुके हैं। इनके लिए संबंध,व्यवहार, और रिश्ते शोकसभा का कच्चा माल हैं। इसके पकने का शोकसभानंदजी धैर्यपूर्वक इंतजार करते हैं। पूचने पर बड़े ही दार्शनिक अंदाज़ में कहते हैं कि- सहज पकै सो मीठो होए..। मोबाइल पर मैंने  इनसे पूछा- कहिए शोकसभानंदजी आज कौन-सा विकेट गिरा। उन्होंने झुंझलाकर कहा-क्या मतलब है,आपका। अभी तो कहीं कोई क्रिकेट मैच नहीं हो रहा। और फिर आप कबसे क्रिकेट में दिलचस्पी लेने लगे। मैंने कहा भैया मैं उस क्रिकेट की बात कर रहा हूं,जिसके कि आप स्पेशलिस्ट हैं। जाने कितनी सेंचुरी बना चुके हैं,आप। और अब भी नाट आउट हैं। शोकसभा के टेस्टमैच के आप बेताज बादशाह हैं। इसलिए मैंने पूछा कि आज कौन-सा विकेट गिरा। शोकसभानंदजी बोले- एक तो मैं समाजसेवा करता हूं,अपना समय लगाता हूं और आप लोग हैं कि मुझ पर फब्तियां कसते रहते हैं।  अच्छा सुनिए मेरे पास टाइम कम है। कम-से-कम सौ लोगों को अभी सूचना देनी है। सौ लोगों को फोन करो तो पलट के पचास लोग आते हैं। आजकल तो लोगों में इंसानियत ही नहीं रही। अरे भई यह तो व्यवहार है। अगर आप लोगों की अंत्येष्टी में नहीं जाओगे तो आप की अंत्येष्टी में कौन आएगा। आपको बता दूं कि कल रात कालीप्रसाद अवस्थी नहीं रहे। आज 11 बजे उनका अंतिम संस्कार है। मैं तो रात से वहीं डटा हुआ हूं। और इतनी कुशलता से रो रहा हूं कि  उनके दूर-दराज के रिश्तेदार तो मझे ही उनका बेटा समझकर ढांढस बंधा रहे हैं। शोकसभानंदजी  ने हंसते हुए बताया कि- असली बेटे इस बात से ज्यादा दुखी होकर रो रहे हैं कि आरीजनल बाप तो हमारा मरा है और ये डुप्लीकेट सारा क्रडिट खुद लिए जा रहा है। शोकसभानंदजी पुराने अभ्यासी हैं, उन्हें रोने-धोने की प्रतियोगिता में कौन मात दे सकता है। इन बेचारों के तो इकलौते पिताजी थे और वह भी पहली-पहली बार मरे थे। शोकसभानंदजी  ने बेटों से कहा- कब तक पिताजी की मिट्टी खराब करोगे,मुझे पैसे दो तो अर्थी,कफन तथा अन्य जरूरी सामान लेकर आऊं। सबसे मेरा परिचय है। माल ठीक और सस्ता मिलेगा। श्मशानभूमि में भी एडवांस बुकिंग करानी पड़ेगी। आजकल सीजन चल रहा है। मुर्दों का काफी रश रहता है। लकड़ी कितनी लेनी है। खाली चालू लकड़ी, या फिर चंदन की भी लेनी है। वीआईपी कोटेवालों को ही चंदन की लकड़ी मिलती है। थोड़ी-सी तो लेनी चाहिए। इससे समाज पर इंप्रेशन पड़ता है। और वैसे भी कौन से पिताजी रोज़-रोज़ मरते हैं। दिल खोलकर क्रियाकर्म करिए।  यह था शोकसभानंदजी का इमोशनल अत्याचार। उन्होंने रोकड़ झटके और चल दिए अपनी दिहाड़ी बनाने। जब अर्थी उठी तो शोकसभानंदजी की खुशी छुप नहीं रही थी। अच्छा कमीशन सूत लिया था। इसलिए इंकलाबी अंदाज़ में कह रहे थे-राम नाम सत्य है,सत्य बोलो गत्य है। सभी लोगों के अकर्षण का केन्द्र बने हुए थे- शोकसभानंदजी। बीट-बीच में वे मोबाइल से जनाजे का लाइव टेलीकास्ट करते जा रहे थे। थोड़ी देर में हमलोग श्मशानघाट पहुचनेवाले हैं। बिजली वाले श्मशान पर मत चले जाना।  लकड़ीवाले पर ही आना। चंदन की लकड़ी भी मंगवाई है,लड़कों ने। बड़े अच्छे लड़के हैं। भगवान करे,ऐसे बच्चों के मां-बाप तो रोज़-रोज़ मरें। उत्साह में शोकसभानंदजी कह गए। फिर गलती का एहसास हुआ। दांत से जीभ काटी और तुरंत फोन काट दिया। और फिर किसी और को सूचना देने लगे। चिता को सजाने में भी पूरे उत्साह से उन्होंने बेटों को सहयोग दिया। भारी लकड़ी को सीने पर रखते। फिर मुआयना करने के बाद लड़कों से कहते,कैसी फिट बैठी है,ये लकड़ी इनके सीने पर। ऐसा लग रहा है पेड़ पर स्पेशली आपके पिताजी के लिए ही उगी थी। वो वाली लकड़ी पैरों पर रखिए। मेरा तजुर्बा है। इससे लाभ उठाइए। वरना बहुत परेशानी होगी। बीच-बीच में मोबाइल पर किसी को बताते,जल्दी आ जाइए। मुखाग्नि का आयटम शुरू होनेवाला है। और ये चैनलवाले कहां मर गए।  ग्यारह का टाइम दिया था। अब 11.30 हो गए। अभी तक एक भी नहीं आया। अरे फोकट में कौन आता है। मैंने तो पहले ही लड़कों से कहा था कि मीडिया के लिए अलग से व्यवस्था करनी पड़ेगी। कहने लगे कि ऐसे मौकों पर थोड़े ही लेन-देन होता है। अब उन्हें कौन समझाए कि देश में हजारों लोग रोज़ मरते हैं मगर कवरेज कितनों की होती है और क्यों होती है। अरे कवरेज की लालसा में रोज़ कितने लोग मर जाते हैं। मगर मरकर भी बेचारों की कवरेज नहीं होती। साले भ्रम में जी रहे हैं। अरे जब कफन फ्री नहीं मिलता तो कवरेज कैसे फोकट में हो जाएगी। अब करा लें कवरेज। लड़कों को जाकर हड़काया-भड़काया- कि बिगाड़ दिया ना खेल। टाइम निकला जा रहा है,और कोई भी चैनलवाला नहीं आया। आप लोगों को कम-से-कम ऐसे मौके पर तो कंजूसी नहीं करनी चाहिए थी। अरे यही तो मौके होते हैं कवरेज हड़पने के। पिताजी जिंदगीभर कवरेज के लिए तरसते रहे। विरोधी हर जगह टंगड़ी मारते रहे। आज हाथ आया मौका फालतू में गंवा दिया,आप लोगों ने। अभी भी कहें तो डील करूं। श्मशानघाट पर कुछ लोगों के बाइट्स तो आने ही चाहिए। इससे शोकसभा में सो आ जाता है। इसबार शोकसभानंदजी  का तीर निशाने पर लगा। लड़के टूट गए। अच्छी रकम एंठने के बाद पूरे जोर-शोर से शोकसभानंदजी मीडिया को इक्ट्ठा करने में लग गए। चूंकि मीडिया शोकसभानंदजी  के कहने पर आया था इसलिए सब जगह शोकसभानंदजी  छाए रहे। मीडिया ने शोकसभानंदजी  को ऐसे प्रचारित कर दिया जैसे दिवंगत साहित्यकार इनके गुरू न होकर ये ही उनके गुरू हों। अब मरनेवाला आकर खंडन तो करने से रहा। इस तरह हर साहित्यकार के मरने पर ठिगने कदवाले शोकसभानंदजी  साहित्य में दो-चार इंच ऊंचे बढ़ जाते हैं। इनके कद की बढ़ोतरी के लिए जरूरी है किसी का मरना। और फिर उसकी दिव्य और भव्य शोक सभा भी होना। शोकसभा इनके व्यक्तित्व विकास का कच्चा माल है। रासायनिक खाद है। इंतजार कीजिए आपके मोबाइल पर भी जल्दी ही शोकसभानंदजी  दस्तक देनेवाले हैं,क्योंकि इन दिनों शहर में कई साहित्यकार बीमार चल रहे हैं।
आई-204,गोविंदपुरम,गाजियाबाद
मोबाइल-9810243966
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