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Friday, December 10, 2010

कवि मन की उलझन

"मन " के अल्फाज़ सिर्फ फितरत  के लतीफ़ जज्बातों के अफ़साने ही नहीं ,बल्कि कुदरत के सोजो-साज़ पर सदाक़त की रोशनाई से उकेरे तराने हें !
ऐसे तराने जिनमें कायनात के  मो"तबर रंग और हयात की तारीख़  की दास्तान है !मन के अफ़कार जब मन -वीणा के तारों की पाकीज़ मोसिकी   में ढलते हें, तो रूह का पैकर ऑंखें खोलता है !..और दिलों से बे-साख्ता आवाज़ उभरती है ....
 मन के मन की उलझी उलझन 
 मन को  ही  सुलझानी  होगी !
मंजु ऋषी  की लेखनी  को मेरे प्रेम !.....................प्रशांत योगी
 
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