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Saturday, January 8, 2011


श्री परमार, अशोक मनोरम तथा डा नीलम ने हमारा उत्साह बढ़ा या है और मैं प्रयास कर रहा हूँ क़ि इस शुभ चर्चा को आगे बढाया जाए..
पंडित सुरेश नीरव ने वाद को सकारात्मक दिशा में धार दी है॥ उनका यह कथन माननीय है :

" शब्द की व्युतपत्ति और उसकी भावयात्रा की अगर बारीक पड़ताल की जाए तो व्यक्ति अपनी धारणाओं और अवधारणाओं का कौतुक ध्वस्त होते हुए स्वयं देख सकता है। लेकिन सबकी अपनी मान्यताएं और अवधारणाएं होती तो है हीं। अगर नहीं होंगीं तो ध्वंस किसका होगा। और ध्वंस ही निर्माण का कारण भी है। निर्माण और ध्वंस अन्योन्याश्रित हैं।"

मैंने भी यही प्रयास किया था और मान्यताएम तथा अवधारणाएं स्पष्ट तो हो रही हैं, वास्तव में स्पष्ट होना ही तो ध्वंस और निर्माण है..

वे आगे लिखते हैं, " मैं तो कृति को प्रकृति से ज्यादा महत्वपूर्ण मानता हूँ "॥

जब तक पृथ्वी पर मानव नाहीं आया था प्रकृति ही मुख्यतया विकास क़ी धारा निश्चित कर रही थी..मनुष्य अपनी कृतियों द्वारा ही संस्कृति, विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी में विकास लाया है॥ मैं कृति से अधिक संस्कृति को महत्वपूर्ण मानता हूँ.. कहा भी है " जन्मना जायते शूद्रः , संस्कारात द्विज उच्यते॥" जन्म से हम सभी ( तथाकथित ब्राह्मण , क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ) शूद्र अर्थात अशिक्षित, असभ्य तथा मानव शारीर में पशु तुल्य हैं॥ मानवीय संस्कारों से ही हम मानव बन सकते हैं..इन्हें ही द्विज अर्था दुबारा जन्म लेने वाला कहा गया है॥

उनका यहाँ कथन भी माननीय है : "मतलब ये हुआ कि देखती आंख नहीं है। देखता ध्यान है। देखती चेतना है।"

गौर से देखा जाए तब साक्षी का अर्थ ' चेतना से ही देखना है - आंख के देखे को चेतना 'देखे' (देखने में समस्त इम्द्रियों के कार्य समाहित हैं) क़ी यह शरीर तथा इन्द्रियाँ क्या कर रही हैं; स्वयं उसमें लिप्त न हो केवल देखे और शरीर के सुख तथा दुःख को देखते हुए उनसे मुक्त रहे॥, आनंद में रहे..यही बात नीरव जी ने प्रारम्भ में ही कह दी थी - --"सुख को धकेलकर जब चेतना आनंद को उपलब्ध होती है तो जरूर कुछ महत्वपूर्ण ही होता है।"

यह भी सच है क़ी शब्द तो अर्थ का स्पर्श भी नहीं कर पाते - 'नानु शब्दा: स्प्रिश्यन्ति अर्था:' किन्तु हम क्या करें हमारे अभिव्यक्ति के साधन भी सीमित हैं , हम इन्हीं शब्दों के द्वारा ही तो अर्थ तक पहुंचते हैं, 'वादे वादे जायते तत्त्व बोध:'॥ इन्हीं शब्दों के द्वारा हम नीरव तक पहुंचाते है, चुप्पी तक पहुंचते हैं..शब्द ॐ के द्वारा हम अनिर्वचनीय ब्रह्म तक पहुंचते हैं..
शब्द की महिमा भी अपरम्पार है..
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