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Tuesday, January 25, 2011

हंसजी प्रेम के परमहंस हैं

श्री भगवान सिंहजी हंसजी
मैं आपके भावप्रवण आलेख पढ़ता रहता हूं। आपके हृदय में करुणा और मन में प्रेम का असीम सागर हिलोरें लेता रहता है। इसलिए आपकी लेखनी से सदभाव के फूल झरते रहते हैं। आपने गुरू को लेकर जो विचार व्यक्त किए हैं वह आज के दौर में दुर्लभ वैचारिक वैभव है। मैं आपको हृदय संत मानता हूं तभी आप भरतचरित-जैसी रचना कर सके और पंडित सुरेश नीरव-जैसा गुरू पा सके। मेरे सादर पालागन आपको समर्पित हैं।क्या लिखा है आपने-
इसलिए मैं गुरु की मंगलरुपी चरणरज का ही अनुष्ठान करता हूँ। मैं अपने को बड़ा धन्य समझता हूँ, बड़ा भाग्यशाली समझता हूँ और गर्व महसूस करता हूँ कि पंडित सुरेश नीरवजी की शरण में मैं श्रद्धानवत हुआ। उन्होंने मुझे अपनी चरणरज का स्पर्श दिया। पोथी पढ़ने या लिखने से ज्ञान मिल सकता है परन्तु संज्ञान की पराकाष्ठा की परिधि में नहीं पहुँच सकता है। कबीर की वाणी का सत्यार्थ प्रकाश ज्योतित है कि पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोई। फिर वहाँ केवल गुरु की शरण ही शेष रह जाती है। और इससे बड़ा कोई तीर्थ नहीं है। भरत में एक भाव की संलग्नता थी उस गुरु के प्रति। मैं गुरु की मंगलरुपी चरणरज का ही अनुष्ठान करता हूँ। मैं अपने को बड़ा धन्य समझता हूँ, बड़ा भाग्यशाली समझता हूँ और गर्व महसूस करता हूँ कि पंडित सुरेश नीरवजी की शरण में मैं श्रद्धानवत हुआ। उन्होंने मुझे अपनी चरणरज का स्पर्श दिया। पोथी पढ़ने या लिखने से ज्ञान मिल सकता है परन्तु संज्ञान की पराकाष्ठा की परिधि में नहीं पहुँच सकता है। कबीर की वाणी का सत्यार्थ प्रकाश ज्योतित है कि पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोई।
फिर वहाँ केवल गुरु की शरण ही शेष रह जाती है। और इससे बड़ा कोई तीर्थ नहीं है। भरत में
एक भाव की संलग्नता थी उस गुरु के प्रति।
ओमप्रकाश चांडाल
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