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Sunday, January 2, 2011

क्योंकि वहाँ प्रेम नहीं था


आदरणीय प्रशांत योगीजी नमन। आपको बधाई ऐसे ज्ञानवर्धक आलेख के लिए -जब मैं था तब हरि नही। क्योंकि वहाँ प्रेम नहीं था। प्रेम में भूख-प्यास या इस नश्वर का आभास ही नहीं होता है। प्रेम में एक सिहरन होती है , एक श्रद्धा होती है जो इन चक्षुयों से दिखाई नहीं देती है या यों कहिए कि वह किसी को द्रष्टिगोचर नहीं होती है। कबीर के अन्तः में उस अगोचर के प्रति सात्विक प्रेम था। और उसको वह चिल्ला- चिल्ला कर मंदिर या मस्जिद में बताये कि मैं उस स्रष्टिकर से प्यार करता हूँ। नहीं। रुक्मणी तो कृष्ण की अर्धांगिनी थी। क्या उसका प्रेम कृष्ण के प्रति कम था। परन्तु मीरा का प्रेम सात्विक प्रेम था जिसको वह अनायास कहती थी कि मेरौ तौ गिरधर गोपाल, दूसरौ नाहि कोई। नानक, रैदास, ईशामसीह, मौहम्मद इत्यादि के ह्रदयसरोवर में सात्विक प्रेम की ही भागीरथी बहती थी। इसलिए उनके अंतर्मन में मैं नहीं था। अतः उनके अध्यात्मिक घी से संज्ञान की बाती से प्रेम की सात्विक ज्योति आज भी जल रही है। जिसमें एक अमित आनंद की अनुभूति होती है और इसी आनंद में प्रेमीजन उस अनंतता के दर्शन करता है जिसकी पहुँच बड़ी दुर्लभ है। उधर -मैं -में भौतिकता का आभास होता है। उस भौतिकता से वह अगोचर अनभिग्य रहता है। वह तो प्रेम के ही वशीभूत है। वह प्रेमीजन के लिए दौड़ा चला आता है। भक्त प्रहलाद का प्रभु के प्रति सच्चा प्रेम था तभी तो उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सका। दूसरी तरफ मैं यानी हिरन्यकश्यप का विनाश हो गया। मैं के विनाश लिए प्रभु भौतिकरूप से जीव धारण करता है। और प्रेम के लिए वह दिखाई नहीं देता है यानी परोक्षरूप से आता है और उसको मुक्त करता है। भरत के अन्तः में प्रभु श्रीराम के प्रति प्रेम की सात्विक ज्वाला धधक रही थी। राम नहीं आये तो वह भरत उनकी खडाऊं आपने माथे पर रख लाता है और उनकी पूजा करता है। उन खडाऊंओं में भरत को प्रभु के साक्षात दर्शन होते हैं और अंततः प्रभु श्रीराम प्रेम के वशीभूत हो जाते हैं। राज्य का लेना-देना तो म्रत्यु जनों के लिए एक लीला है जो हम सबको दिखाई देती है। जब भरत हनुमान को तीर से गिरा दिया तो हनुमान बोले कि मैं राम का भक्त हनुमान हूँ। हनुमान मैं का प्रयोग प्रभु का भक्त होने के लिए करते हैं। तो वहराम भक्त कहने से भी नहीं उठे। तभी तो कहा है - टस से मस होय न हनुमाना , धरणी पडा कराह निदाना। जब भरत ने राम का नाम लिया तो उसको उसको पर्वत सहित तीर पर बिठाकर प्रभु के पास पहुंचा दिया। यही सच्चा प्रेम है। श्री योगीजी को मेरे प्रेम।
-भगवान सिंह हंस
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