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Sunday, January 2, 2011

सहकारिता - कल. आज और कल




मैं तो डाक्टर प्रेमलता नीलम के आश्वासन पर 'सहकारिता' पर किश्तें प्रस्तुत किये जा रहा हूं।
इसमें मैने १,२, ३ किश्तों को दुहरा दिया है (क्यों कि नियम के अनुसार
पिछली किश्तें गायब होती जा रही‌हैं,) ताकि नए पाठकों को पूरा लेख मिल सके ।
पहले तीन पैरे हल्के हैं और् चौथा पैरा प्रगाढ़ है।
यह भी बतला दूं कि इस लेख की प्रस्तुति इसलिये की‌जा रही है कि मैने पंडित सुरेश नीरव को सहकारिता की जीवन्त मूर्ति तो हमेशा पाया है, किन्तु एक विशेष अनुभव हुतात्मा रामप्रसाद बिस्मिल के श्रद्धा दिवस पर मेरे घर में‌हुई गोष्ठी के समय हुआ था, जब उऩ्होंने बतलाया कि किस तरह किन किन कठिनाइयों को जीतते हुए उन के दल के साथ, विशेषकर पथिक जी तथा पुरुषोत्तम सिंह जी के साथ, बिस्मिल पर एक फ़िल्म का निर्मान किया था।

सहकारिता - कल. आज और कल

1. कल्पना करें आज से पच्चीस हजार वर्ष पहले की जब आदमी मुख्यतया शिकार पर ही जीवन यापन करता था। मनुष्य की अपेक्षा सृष्टि के अनेक अन्य जानवर उससे कहीं अधिक सशक्त रहे हैं। बाघ या सिंह वन में राज्य करते रहे हैं; तब यह उनसे दुर्बल जीव मनुष्य कैसे अपनी रक्षा कर पाया, और उन सशक्त जानवरों का भी राजा बन गया? जंगल में जहां उसे हिरन या मोर आदि का शिकार करने जाना होता था, वहां तो इऩ्हीं आक्रामक और शक्तिशाली जानवरों का राज्य होता था। तब वह वहां कैसे आखेट के लिये अकेले जा सकता ! उसे तो दल बनाकर ही‌ जाना पड़ता होगा, ताकि चारों दिशाओं पर (वैसे तो छह दिशाएं कहना चाहिये - एक ऊपर क्योंकि झाड़ों पर से भी आक्रमण हो सकते थे - और नीचे सरी सृपों से रक्षा के लिये) चौकस रखी‌ जा सके। यदि शारीरिक रूप से दुर्बल मानव जाति इन भयंकर जंतुओं के रहते अपनी रक्षा तथा योग क्षेम मात्र लाठी तथा पत्थरों से कर सकी थी, तब इसमें संदेह नहीं होना चाहिये कि यह 'सहयोग' या सहकार से ही हुआ। सहयोग के तत्काल प्रतिदान की अपेक्षा नहीं होती सिवाय इसके कि 'शुभ कामनाएं' मिलें। किन्तु उस काल के आखेट में सहयोग में भी‌ कुछ स्पष्ट 'लेन देन' की भावना या मान्यता रहती होंगी, जैसे कि शिकार (हिरन) का मांस सभी‌ में‌ बँटता होगा, वास्तव में वह सहयोग अलिखित सहकार ही था, लिखित अनुबन्ध तो उन दिनों नहीं होते थे।

आखेट और रक्षा का यह सहयोग तथा सहकार हमारे जीन्स या आनुवंशिकी‌ में पर्याप्त मात्रा में‌ आ गया है; किन्तु इससे अधिक मात्रा में तो हमें स्वार्थमय योगक्षेम ही‌ मिला है, और सौभाग्य कि इससे भी अधिक हमें संतान प्रेम मिला है।

यह तो हमें मालूम है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी‌ है जैसे चींटी, मधुमक्खी आदि, क्योंकि इनके सदस्यों में समाज के हित के लिये कार्य, स्व की देखभाल के अतिरिक्त, बँटे रहते हैं। और इसीलिये, यह गुण न होने के कारण, बाघ, सिंह, बिल्ली आदि सामाजिक प्राणी नहीं हैं। भेडिये, जंगली‌ कुत्ते आदि को हम अर्ध सामाजिक कह सकते हैं, क्योंकि इनमें‌ सहयोग शिकार करने तक ही सीमित होता है। किन्तु यह दृष्टव्य है कि समाज का लाभ सभी प्राणी उठाते हैं, और समाज को लाभ भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, सभी प्राणी पहुँचाते हैं। इसलिये वर्गवादी दृष्टि की अपेक्षा समग्र या समग्रतर दृष्टि अधिक वांछनीय है।

2. सहयोग तथा सहकार में बारीक अंतर है, क्योंकि बिना सहयोग की‌ भावना के सहकार नहीं हो सकता। एक तो सहयोग अनौपचारिक है, और सहकार औपचारिक जिसमें नियम या अनुबन्ध भी होते हैं। किसी कार्य को लिखित साझारूप से आपस के लाभ के लिये करना सहकार है। सहकार में साझा व्यक्तियों के उद्देश्य तथा कार्य विधि में सहमति होना आवश्यक है। सहयोग में करने वाले को किसी अन्य लाभ की अपेक्षा नहीं होती, जब कि सहकार में लाभ या हानि बाँटी जाती है। सहयोग करने वाले पक्षों के बीच घनिष्ठता तथा मैत्री होती‌ है, यद्यपि यह अनिवार्य नहीं, जब कि सहकार में मैत्री की‌ भावना आवश्यक है। जब भिन्न लोगों के ध्येय या उद्देश्य में समानता हो तब उनमें भी सहयोग हो सकता है। जब कुछ दल या लोग मिलकर किसी‌ मित्र को ही धोखा देकर अपना लाभ कमाएं तब वह सहकार उनके बीच मिलीभगत कहलाता है। जब कोई अधिक समर्थ अपने किसी मित्र या संबन्धी मातहत की अनैतिक सहायता करता है तब उस सहयोग को सरपरस्ती कहते हैं। सहकार में सहयोग के गुणदोष आ सकते हैं। यद्यपि सभी प्रकार की सहायता या दान सहयोग कहलाया जा सकता है, तथापि किसी के द्वारा भी‌ कार्य किये जा रहे ध्येय के साथ यदि आपकी सहमति या सहानुभूति है, और देश काल के थोड़े बड़े स्तर पर जब उसकी आप जो सहायता करेंगे, उसे सहयोग कहा जाएगा। इस तरह हम देखते हैं कि सहायता की अपेक्षा सहयोग देश काल के थोड़े बड़े स्तर पर होता है।

सहकारी संस्था : आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक आवश्यकताओं तथा उद्देश्यों की पूर्ति के लिये स्वेच्छा से संगठित, जनतांत्रिक पद्धति से चालित एवं सभी सदस्यों के स्वामित्व में कार्यरत स्वायत्त संस्था सहकारी संस्था कहलाती है। संस्था का स्वायत्त रहना प्रत्येक दशा में अनिवार्य है अन्यथा संगठन अपने मार्ग से भटक सकता है। यदि कार्य करने के लिये धन की आवश्यकता हो तब संगठन के सदस्य बराबरी से धन का निवेश करते हैं, और हानि लाभ भी बराबरी से बाँटते हैं। ऐसी संस्थाएं अपनी सफ़लता के लिये कुछ जीवन मूल्यों के अनुपालन की माँग करती हैं, यथा, सच्चाई, जनतंत्र, न्याय, एकता, खुलापन, सामाजिक उत्तरदायित्व तथा समाज - सेवाभाव आदि। इसकी कार्यपद्धति सहकारिता तथा विचारप्रणाली सहकारवाद कहलाती है। सहकारी का मुख्य उद्देश्य हिस्सेदारों को अधिकतम लाभ देना नहीं, वरन अपने ग्राहकों या लक्ष्य मनुष्यों को मूल्यवान सेवा देना है। यह वे तभी कर सकते हैं कि जब वे स्वयं मानवीय जीवनमूल्यों पर आचरण करें। अत: सदस्यों का सहकारी विचारधारा में शिक्षित होना भी आवश्यक है। सहकारी संगठन अनेक प्रकार के होते हैं, यथा, गृह निर्माण, विक्रय, कर्मचारी, उपभोक्ता, किसान, मजदूर, महिला जागरण, शिक्षण, जिज्ञासा, प्रकृति संरक्षण इत्यादि।

3. सहकारिता तथा प्रेम में गहरा सम्बन्ध है। वैसे तो 'लगाव' से ही लोग आपस में जुड़ सकते हैं, और कार्य भी कर सकते हैं, किन्तु लगाव में वह सेवा भाव नहीं हो पाता जैसा कि प्रेम में‌ होता है। प्रेम सहज ही सहायता करने की प्रेरणा और शक्ति देता है। प्रेम सहकारिता की शक्ति को और सुदृढ़ करता है। बिना प्रेम के सहायता या सहकारिता निरी व्यावसायिक कहलाती‌ है। सहकारिता सफ़लता के लिये 'नैतिकता' की‌ मांग करती है, अन्यथा इसमें अक्सर एक पक्ष की स्वार्थ सिद्धि तो हो सकती है, किन्तु दोनों पक्षों के लाभ की सही सिद्धि शायद ही हो; किन्तु थोड़ा सा भी प्रेम होने पर दोनों पक्षों के उचित स्वार्थ की सिद्धि हो सकती है। ग्वाला प्रेम होने पर नकली दूध तो नहीं बेचेगा। दान की अपेक्षा रखने वाले विद्वान साधुओं के भी संगठन होते हैं, जिनकी कार्य पद्धति 'सहकारी' नहीं होती, उनके प्रवचन व्यवसाय नहीं‌ वरन सहायता हैं क्योंकि वह श्रोताओं के जीवन के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हैं और सुखी जीवन के लिये सहायता करते हैं, उनमें आपके लिये प्रेम है, उनका कार्य व्यवसाय नहीं‌ है, यद्यपि इसके अपवाद भी होते हैं। अपने लाभ के लिये स्वकेन्द्रित व्यक्ति हानिकारक चिप्स तथा कोला भी बेचेगा या बिकवाएगा चाहे वह कोला की कम्पनी या आपका प्रिय क्रिकैट का हीरो या फ़िल्मों का हीरो क्यों न हों, उनसे हमें सावधान ही रहना चाहिये क्योंकि इस तरह यह सच्ची सहायता नहीं, वरन लूटने वाला व्यापार हैं, वे आपकी सहृदयता का शोषण कर रहे हैं!!

सहकारिता का कार्यक्षेत्र बहुत विशाल तथा गहरा है। पति पत्नी का जोड़ा परिवार की इकाई है, जो संतान का पालन पोषण कर सृष्टि को चलाता है। भारतीय परम्परा में वैवाहिक सम्बन्ध संस्कारों पर आधारित होते हैं; किन्तु आजकल पति पत्नी के संबन्ध भी 'सहकारिता' के अन्दर आने लगे हैं क्योंकि वे एक तरह के कानूनी अनुबन्ध हो रहे हैं। यदि इनमें प्रेम या सहयोग या सहकारिता (अनुबन्ध विवाह में) न हो तो पति पत्नी तो दुखी होंगे ही, सृष्टि ही दुखी हो जाए। पति तथा पत्नी के बीच सहयोग या सहकारिता सहज है भी और नहीं भी। सहज इस अर्थ में है कि पुरुष और नारी में सहज आकर्षण तो होता है और वे एक दूसरे की सहायता सहर्ष कर सकते हैं। किन्तु अक्सर यह आकर्षण अपने भोग के लिये ही सहयोग उत्पन्न करता है, अत: उसमें स्थायित्व कठिनाई से ही आ सकता है। अतएव उसे अपेक्षाकृत स्थायी बनाने के लिये संस्कृति और समाज उनके बीच सच्चा प्रेम उत्पन्न कराते हैं, वरना यह जीवन चक्र सुचारु रूप से नहीं चल सकता। माता पिता तथा संतान के बीच प्रेम या सहयोग या सहकारिता (दुर्भाग्य ही कहना पड़ेगा कि, बच्चों के मानवाधिकार के नाम पर इस पावन संबन्ध को भी 'अनुबन्ध' बनाया जा रहा है) इतनी अधिक महत्वपूर्ण है कि प्रकृति ने इसे तो सहज या जन्मजात बना दिया है, तब भी संस्कृति का कार्य इसमें भी महत्वपूर्ण है।

सहकारिता के बिना न तो यह शारीरिक रूप से दुर्बल मनुष्य अपनी रक्षा कर पाता और न अपना विकास, क्योंकि आदिम काल में‌ तो पहले उसके पास लाठी और पत्थर के अतिरिक्त हथियार भी‌ नहीं थे। यह तो स्पष्ट है कि सहकारिता पर आएधारित ज्ञान और प्रौद्योगिकी के बिना न तो विद्युत, यांत्रिक वाहन, विमान, उपग्रह, मोबाइल फ़ोन, टीवी, चिकित्सा, नगर आदि होते और न यह सभ्यता होती। किन्तु मानव समाज की संस्कृति कैसे भ्रष्ट हो गई? जैसे ही सहकारिता निरी व्यावसायिकता में बदल गई, वैसे ही संस्कृति भोगवादी संस्कृति बन ग़ई। आज मनुष्य न केवल हाथियों और सिंहों पर राज्य कर रहा है, वरन अपनी सफ़लता के घमण्ड पर अपने को प्रकृति का स्वामी समझ कर उसका विनाश कर रहा है। उसने न केवल पाँचों तत्वों - आकाश, वायु, अग्नि, जल और मिट्टी (पृथ्वी) को प्रदूषित कर दिया है, वरन छठवां तत्व हमारा मन भी‌ प्रदूषित कर दिया है।

4. यूरोप में नवजागरण काल में सोलहवीं शती में उद्योगपतियों‌ या व्यवासाइयों के 'गिल्ड' हुआ करते थे जो उद्योग या व्यापार के नियम बनाया करते थे और उनका सभी घटकों में पालन भी देखते थे; किन्तु वह आधुनिक अर्थों में 'सहकारिता' नहीं थी। अधिकांश विद्वान यह कहते हैं कि सहकारिता तो ब्रिटैन की औद्योगिक क्रान्ति पर प्रतिक्रिया की बीसवीं सदी की उपज है। किन्तु यह सुखद तथ्य है कि सहकारिता के विषय में विश्व में सर्वप्रथम श्रमिकों के संगठन, उद्योगपतियों‌ या व्यवसाइयों, तथा गिल्ड, और सहकारिता के नियमों‌ की जानकारी चाणक्य (३३० ईसा पूर्व) द्वारा रचित 'अर्थशास्त्र ' (आर्थिक शास्त्र नहीं, वरन शासन संहिता) में‌ मिलती है और वह भी पर्याप्त विकसित रूप में। शासन निजी तथा शासकीय उद्योगों के कार्यों के सुचालन में उपयुक्त नियमों के बनाने तथा कार्यान्वयन में सक्रिय योगदान करता था।

आजकल अनेक विशाल उद्योग, दूकानें, बैन्क आदि सहकारिता के आधार पर चल रहे हैं, अधिकांशतया, इनके सदस्य उपभोक्ता होते हैं। विदेशों में‌ यह अधिकांशत: सफ़ल हैं किन्तु एशिया में‌ कम ही सफ़ल हैं। सहकारिता को इस देश में भी वांछनीय मह्त्व या सम्मान नहीं मिलता। सोचने की बात है कि सहकारिता की इस नगण्य प्रगति में हमारा चरित्र ही प्रमुख कारण है या इसमें पहले रूसी सोच पर आधारित समाजवाद (संक्षेप में‌ कहें तो यूनिअनिज़म) ने इसका विरोध किया, और बाद में खुले बाजार के पूँजीवाद ने। जब विश्व में इसके तहत खरबों डालर का कार्य सुचारु और व्यवस्थित रूप से चल रहा है, तब हम भी समस्याओं के हल निकाल सकते हैं, किन्तु वे मूलभूत विचार में कमी के कारण सीमित फ़िर भी रहेंगे। सहकारिता के कार्य में कार्मिकों में दक्षता के साथ उपरोक्त मूल्य, यथा, सच्चाई, सेवाभाव, कर्तव्यनिष्ठा आदि अत्यंत आवश्यक हैं। यह चरित्र का विषय तो है ही, किन्तु साथ ही व्यक्ति की समग्र जीवन दृष्टि का भोगवादी‌ न होकर 'त्यागमय- भोगवादी' होना भी आवश्यक है।


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