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Wednesday, January 5, 2011

आपका बहुत-बहुत आभारी







आदरणीय नीरवजी व डा० चतुर्वेदीजी आपके आशीर्सुमन अन्तः से ग्रहण करता एवं आपकी मंगलचरणरज को अपने माथे पर लगाता और अपनी गीली आँखों में आपके स्नेह को संजोता हुआ आपको बार-बार नमन करता हूँ, प्रणाम करता हूँ और पालागन करता हूँ।
भगवान सिंह हंस
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