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Saturday, January 22, 2011

बृहद भरत चरित्र महाकाव्य


कुछ अंश आप सबके स्नेह में -
भरत ने राम दर्शन कीना। हाथ जोड़ खड़ा समीचीना। ।
पुलकित भरत हर्षित शरीरा। चौदह वर्ष बाद दृग बीरा । ।
राम का वन से अयोध्या वापिस आने पर भरत ने राम के दर्शन किए और करबद्ध खड़े हो गए। भरत का शरीर पुलकित और हर्षित हो रहा है। भरतजी कहते हैं कि मैंने अपना भाई चौदह वर्ष बाद देखा है।
इंद्र समान सुशोभित रामा। संग सोहि सीता जस भामा। ।
घुँघराली लट नेत्र विशाला। सत्य पराक्रमी जगत पाला। ।
राम इंद्र के समान सुशोभित हैं। साथ में उनकी प्रिय पत्नी सीता शोभित है। राम की घुँघराली लट हैं और उनके नेत्र विशाल हैं। राम सत्य पराक्रम वाले हैं और वे ही इस जगत के पालनहार हैं।
तन पर पहनें वल्कल चीरा। अँखियाँ ओझल झलके नीरा। ।
प्रभु ने भरत ऊपर चदाया। कर में भरकर अंक लगाया। ।
भरतजी तन पर वल्कल वस्त्र पहने हुए हैं। अँखियाँ ओझल-सी दिखाई देती हैं। भरत की आँखों आँसू झलक रहे हैं। देखकर प्रभु राम ने भरत को विमान में ऊपर चढ़ा लिया और अपनी बाँहों में भरकर अंक से लगा लिया।
प्रभु समीप आनंद विभोरा। साष्टांग जु कैकेयी छोरा। ।
भरतहि लेय लक्ष्मण प्रणामा। सिय को प्रणाम बताय नामा। ।
भरतजी प्रभु श्रीराम के सान्निध्य में आनंद विभोर हो जाते हैं। कैकेयीलाल श्री राम को साष्टांग प्रणाम करते हैं। भरतजी भाई लक्ष्मण का प्रणाम स्वीकार करते हैं। भरतजी सीताजी को करबद्ध प्रणाम करते हैं और अपना नाम बताते हैं।
प्रफुल्लित कैकेयी कुमारा। मिला सुग्रीवहिं सहदुलारा। ।
अंगद नल नील जाम्बवाना। सुषेण ऋषभ द्विविद सम्माना। ।
कैकेयीकुमार भरतजी बहुत प्रफुल्लित हैं। भरतजी सुग्रीव से बड़े स्नेह से मिलते हैं। भरतजी अंगद, नल, नील, जाम्बवान, सुषेण, ऋषभ, द्विविद आदि सब वानरों से बड़े स्नेह से मिलते हैं।
मैंद गवाक्ष शरभ सत्कारा। गंधमादन पनस मिल प्यारा। ।
सर्व वानरहि मनुष्य रूपा। गदगद भरत बिलोक स्वरूपा। ।
भरतजी मैंद, गवाक्ष, शरभ, गंधमादन, और पनस आदि वानरों का बहुत सम्मान करते हैं और सस्नेह उनसे मिलते हैं। सभी वानर मनुष्य रूप में हैं। भरतजी गदगद होकर उस स्वरूप को देखते हैं।
विभीषण से आलिंगन कीना। भ्रात स्नेह भरत समीचीना। ।
औ, कहा तू पांचवां भाई। राम संग उपकार सहाई। ।
भरतजी विभीषण से आलिंगन करते हैं। भरत का भ्रात्र-स्नेह कितना समीचीन है। भरत ने विभीषण से कहा कि तुम मेरे पांचवें भाई हैं जो तुमने राम के साथ उपकार किया है,वह बहुत ही सराहनीय है।
रचयिता- भगवान सिंह हंस
एम-९०१३४५६९४९
प्रस्तुतकर्ता- योगेश विकास
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