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Sunday, January 23, 2011

प्रेम, आस्था और श्रद्धा


प्रेम- प्रेम का शाब्दिक अर्थ है -प्रीति और प्यार। एक कुत्ते का पिल्ला है। उसके रेशम जैसे बाल झबुआ-सा , बड़ी-बड़ी आँखें, मुड़ी हुई पूँछ और सांवला सलौना देखने पर बड़ा सुन्दर लगता है। देखने वाला उससे प्रेम करता है। वह उस पिल्ले को गोद में उठा लेता है। क्योंकि उस पिल्ले से उसको प्रेम हो गया है। अतः प्रेम में भौतिक उपस्थिति आवश्यक है। आप कहेंगे कि लोग दूरभाष पर बात करते है। वहाँ तो भौतिकरूप द्रष्टिगोचर नहीं होता है। हाँ, परन्तु वहाँ वे दोनों एक माध्यम से जुड़े हैं और वे साक्षातरूम में बार्तालाप कर रहे हैं। वहाँ उन दोनों के बीच आभास नहीं है और नाहीं अंदाज। यदि एक बोलेगा और दूसरा निरोत्तर होगा तो प्रेम की पराकाष्ठा उत्पन्न नहीं हो सकती है। और नाहीं उससे कोई लगाव होगा। वैसे ही संसर्ग में साथ रहना अपरिहार्य है। आभास होने से काम नहीं चलता है। कहीं-कहीं तो विलोमी लिंग का भी होना आवश्यक हो जाता है संसर्ग हेतु। लव इज गोड। नो। दो प्रेमी-प्रेमिका कहते हैं कि लव इज गोड। उन दोनों में प्यार है। सारा समाज थू-थू कर रहा है। उनका संसर्ग अपरिहार्य है। परन्तु वह उस अगोचर की प्राप्ति नहीं है। यही एक भूल है ईश्वर प्राप्ति की। वह बहुत ही अगोचर है। वह इन आँखों से कदापि नहीं दीखेगा। उसके लिए नीरव बनाना होगा और वह बनना बड़ा दुर्लभ है।
आस्था- आस्था में थोड़ा अंतर है। आस्था एक आलंबन है जो बुद्धि से उत्पन्न होती है और अमुक को देखने की चेष्टा करती है। उसको एक सहारा मिलता है। यह प्रेम से हटकर है। परन्तु प्रेम से उत्तम है उस अगोचर को पहिचानने के लिए।
श्रद्धा- श्रद्धा एक समर्पित भाव है जो स्वतः उत्पन्न होती है। उसको किसी प्रेम या संसर्ग या किसी आलंबन की आवश्यकता नहीं होती है। उसको केवल नीरवता की ही आवश्यकता है। उसको न कोई लालच और न कोई चाह है। वह तो नीरव है। उस प्रभु तक पहुँच तो सकते नहीं। इसलिए उसको पाने के लिए या अपनी मुक्ति के लिए गुरु की शरण में जाना अपरिहार्य है। वही जीवन की पहुँच है।
भगवान सिंह हंस
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